दर्द की नक्शानवीसी

एक थियेटर कलाकार के साथ मिलकर, हमारे डिजिटल एजुकेटर्स ने अपने आसपास के दर्द को महसूस कर उसका नक्शा तैयार किया.

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तसनीम बता रही है कि उस दिन उसके मोहल्ले की मस्जिद में तीन मिट्टियों की नमाज़ एक साथ पढ़ी गई थी. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और पूरे मोहल्ले का माहौल ग़मगीन हो गया था.

श्रेया अपनी सहेली के बारे में बताती है, जिसकी मम्मी के कोविड से गुज़र जाने के बाद अब वह अनाथ हो गई है. वह कहती है कि अपनी सहेली को रोते देख उसके भी आंसू नहीं रुकते. “कौन नहीं रोता ऐसे मौके पर?” वह पूछती है.

वनिता अपने गांव के बारे में बताते हुए कहती है कि “जहां पहले लोग एक दूसरे से खुलकर मिलते थे वहीं आज एक दूसरे से दूर भागते हैं और एक दूसरे को डर की नज़रों से देखते हैं.” वनिता की बात से सहमत होते हुए अन्य साथी भी बताते हैं कि खेल के मैदान, मंदिर, हैंड पंप, दूध की दुकान और पास वाले नीम के पेड़ पर पड़ा झूला – जहां पहले लोगों की ख़ूब चहल पहल रहती थी अब बिलकुल सूनसान पड़े हैं.

आबिदा का मानना है कि गांव में लगभग हर घर में किसी न किसी तरह का दर्द है, लोग परेशान हैं.

ग्रामीण उत्तर प्रदेश, राजस्थान और झारखण्ड से जुड़े द थर्ड ऑई के डिजिटल एजुकेटर्स की इन कहानियों को सुनते हुए मुझे बेचैनी सी महसूस हो रही है. इस बीमारी ने हमारा बहुत कुछ हमसे छीन लिया है. इसके बारे में बात करते हुए कौन सी भाषा और कौन से शब्द हमारा साथ देंगे? ये बातें हम किससे और कहां कर सकेंगे? वे कौन सी जगहें होंगी जहां ये बातें की जा सकेंगी और जहां हम एक दूसरे को थामें खड़े होंगे, चुपचाप!

बातचीत की साझा ज़मीन

अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर मैं तसनीम, वनीता जैसे तमाम अपरिचितों को देखती हूं और मेरे मन में कई जाने-पहचाने सवाल मंडराने लगते हैं. ज़ूम मीटिंग में और नए साथी जुड़ते जाते हैं. मेरी भूमिका संचालक की है, मैं एक गहरी सांस के साथ अपने आपको सत्र चलाने का साहस देती हूं.

कोविड की दूसरी लहर की तबाही के बीचों-बीच हमने थर्ड आई के डिजिटल एजुकेटर्स के साथ यह कार्यशाला की थी. मेरे लिए भी एक नया अनुभव था. थिएटर, मानसिक स्वास्थ्य और आध्यात्म के अपने अनुभवों के आधार पर मैंने कार्यशाला से जुड़े साथियों से बात कर हर संभव कोशिश की, जिससे उन्हें एक सार्थक अनुभव हो और उनके साथ मैं भी अपनी आवाज़ खोज पाऊं.

सत्र का उद्देश्य ऑनलाइन एक ऐसा खुला मंच तैयार करना था जहां महामारी के दौर में पनपी चुनौतियों को एक दूसरे के साथ साझा किया जा सके. देश में 3 राज्यों के 8 जिलों से जुड़े हमारे साथी डिजिटल एजुकेटर्स ने इस सत्र में भाग लिया. मैं थोड़ा नर्वस हूं लेकिन मैं अपने आप को समझाती हूं कि इस समय हम एक साझा दुख में जी रहे हैं, इस माहौल से जूझने में कोई भी सक्षम नहीं हैं. मेरा काम है कोशिश करना.

सत्र की शुरुआत में

मैंने सभी से पूछा कि क्या वे कमरे में अकेले हैं या आस पास लोग हैं? असल में थिएटर की कार्यशाला लोगों को एक जगह एक दूसरे के साथ लाती है, और उस साथ आने की एक अलग ऊर्जा होती है. लेकिन अगर यह मुमकिन न हो, तो कम से कम एक ऐसी जगह ज़रूर हो जहां समाज-परिवार की नज़रों से दूर कोई अपनी बात खुल कर रख सके, या एकांत में किसी गतिविधि में अपने को खो सके.

मुझे पता है कि कार्यशाला में भाग लेने वाले डिजिटल एजुकेटर्स अपने घरों से जुड़ रहे हैं और एक कमरे में अपने आप को बंद कर पाना उनके लिए शायद असंभव हो. संचालन करने के दौरान ऐसी चीज़ों को ध्यान में रखना ज़रूरी है क्योंकि इससे कार्यशाला और उसमें भाग लेने वाले साथियों पर सीधा असर पड़ता है.

किसी भी थिएटर कार्यशाला के महत्त्वपूर्ण तत्व हैं: शरीर और कल्पना का उपयोग, और साथ में थोड़ी चंचलता और लचीलापन. शरीर में जोश और फुर्ती लाने के लिए पहले हमने कुछ हल्के व्यायाम किए. बाद में प्राणायाम. व्यायाम के बाद मैं एक कोमल संगीत चला देती हूं और भाग ले रहे साथियों को अपनी जगह पर आंखें बंद कर लेटने के लिए कहती हूं. यह 20 मिनट का बॉडी स्कैन मेडिटेशन है, जिसमें संगीत की धुनों के साथ वे अपना ध्यान शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर केंद्रित करते हैं. अपनी कल्पना के सहारे वे पैरों के अंगूठों में दबी एक काल्पनिक मोमबत्ती की लौ को शरीर के अलग-अलग हिस्से में घुमाते हुए, उसे पैरों से सर तक लेकर आते हैं और फिर वहां से लौ दिल तक पहुंचती है. इसको करते हुए हम अपने शरीर के साथ एक रिश्ता बनाते हैं और अपनी कल्पना को जगाते हैं. साथ ही इससे कार्यशाला में ध्यान केंद्रित करने में मदद भी मिलती है.

कई साथियों पर इस एक्टिविटी का बहुत सकरात्मक असर दिखा और वे अपने अनुभवों के बारे में बात करने के लिए उत्सुक थे. किसी को अपना शरीर हल्का होते हुए लगा तो एक प्रतिभागी ने कहा कि इस तरह शरीर के अलग-अलग भागों पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया था, “पहले पहल मुझे कुछ नहीं दिख रहा था लेकिन जब लौ दिल तक पहुंची तब ऐसा लगा कि अपने आप को अंदर से पहली बार देख रहा हूं.” लखनऊ से खुशबू ने कहा, “जब लौ दिमाग तक गई तब लगा कि अंदर से सारा कचरा और अंधेरा साफ़ हो गया है.” सभी के लिए यह पहला अनुभव था.

दर्द का नक्शा

न्यूरो साइंस विशेषज्ञों (शरीर की नाड़ियों पर काम करने वाले) का मानना है कि हमारा दिमाग निरंतर भिन्न तरह के नक्शे बनाने की प्रक्रिया में लगा रहता है.

मानसिक रूप से हम जाने-पहचाने ढांचों की तलाश करते रहते हैं जहां हम आसपास हो रही घटनाओं को सहेज कर रख सकें. इसी से दुनिया को लेकर हमारी समझ बनती है. जब हम जानकारी और घटनाओं के समंदर में डूब रहे होते हैं तब यह ढांचा एक सहारा होता है जो हमें समझ के तट पर लाने में मदद करता है.

थिएटर के अभ्यास में दुनिया को समझने की पहली शुरुआत अपने शरीर से होती है. फिलहाल हमारा शरीर किसी स्पॉन्ज की तरह आसपास हो रही और तेज़ी से बदल रही घटनाओं को अपने भीतर ज़ब्त कर रहा है. लेकिन उनको निचोड़ कर निकालने के लिए हमारे पास ज़रूरी मानसिक और भावनात्मक साधन उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के दर्द उभर आते हैं.

इस दर्द को हम महसूस तो करते हैं, लेकिन इसके होने का कारण समझ नहीं पाते. इस कार्यशाला के ज़रिए हमारी कोशिश है कि हम बाहर और भीतर के इस दर्द के बीच एक रिश्ता बना सकें. शरीर के अलग-अलग हिस्सों में लौ ले जाने की गतिविधि भी शरीर का एक नक्शा बनाना ही तो है, जिसकी मदद से हम भीतर की अनजान जगहों में घूमने की कोशिश करते हैं.

कार्यशाला को आगे बढ़ाते हुए मैं, सभी से कागज़ पर अपने मोहल्ले, सड़क या गांव का एक नक्शा बनाने को कहती हूं. नक्शे में उन्हें उन जगहों पर छोटे बिंदु बनाने हैं जहां उन्हें लगता है कि किसी दर्द का अनुभव हो रहा है. यहां दर्द किसी भी तरह का हो सकता है. ज़रूरी नहीं है कि वे कोविड महामारी, मृत्यु, बीमारी या हिंसा से ही जुड़ा हो.

सभी ने बढ़-चढ़ कर इस एक्टिविटी में भाग लिया औऱ अपने नक्शे के ज़रिए अपने आसपास की जगहों से हमारा परिचय करवाया. इनमें से कइयों के लिए दर्द के बारे में बताना आसान था, तो कई ऐसे भी थे जिनका अपना दर्द मोहल्ले की बातों के भीतर कहीं छिपा हुआ था. उनकी बातों के बीच मैं भी उनके दर्द की गवाह बनती हूं और उनके शोक में साथ खड़ी होती हूं.

(प्रतिभागियों द्वारा की गई दर्द की नक्शानवीसी यहां देखें.)

महामारी, दर्द और जड़ता

दरअसल, दर्द हमारे शरीर के लिए रक्षा कवच का काम करता है. विज्ञान के अनुसार किसी हानिकारक स्थिति में दर्द शरीर को चौकन्ना करता है और उसे बचाने की सभी प्रतिक्रियाओं को सक्रिय करता है. लेकिन, हम इसे विज्ञान से नहीं दिल से महसूस करते हैं. वैसे, हमारे शरीर की संरचना ही कुछ ऐसी है कि हम लगातार इससे बचने का प्रयास करते रहते हैं. इसलिए हम दर्द को फौरन मिटाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं. ऐसा करके न सिर्फ़ आराम महसूस होता है बल्कि आगे होने वाली हानि से भी बच जाते हैं.

जैसे, गर्म तवे पर हाथ रखते ही हम अपना हाथ तुरंत दूर कर लेते हैं : परिस्तिथियों से लड़ो या वहां से भाग जाओ ! दर्द से जुडी इस प्रतिक्रिया में सोचने का समय कम होता है. लेकिन एक तीसरी तरह की प्रतिक्रिया भी होती है जिसमें हमारा दिमाग़ हमें कोई संकेत ही नहीं देता. इसे ही स्तब्धता या जड़ती की स्थिति कहते हैं. यह स्तब्धता हमारे लिए हानिकारक है, ये हमारे महसूस करने की क्षमता को असक्रिय कर देती है. दरअसल, शरीर के अंदर काम करने वाले नर्वस सिस्टम, शरीर के अलग-अलग हिस्सों में संदेश भेजकर उन्हें सूचित करने का काम करते हैं, और जिसकी वजह से हम हानिकारक परिस्थितियों से बच पाते हैं, वहीं सुन्न पड़ जाते है.

शरीर में जड़ता के इस ख़तरे को एक और महामारी ने उजागर किया था – कुष्ठ रोग. कुष्ठ रोग में मरीज़ के अंग धीरे-धीरे ख़राब होने लगते हैं. माना जाता था कि ऐसा, कुष्ठ रोग फैलाने वाले बैक्टिरिया के प्रभाव से होता है. लेकिन मिशनरी डॉक्टर पॉल ब्रांड ने अपने शोध के आधार पर बताया कि बैक्टिरिया ख़ुद शरीर के अंगों को नष्ट नहीं करता, बल्कि वो शरीर के नर्वस सिस्टम पर प्रहार कर उसे सुन्न कर देता है. यही वजह हे कि शरीर के अंगों का कुछ भी महसूस होना बंद होता जाता है और धीरे-धीरे वे ख़राब होने लगते हैं. यहां पर दर्द के एहसास के सुन्न पड़ जाने से क्या गंभीर नुक्सान हो सकते हैं इसे साफ़ देखा जा सकता है.

जड़ता की यह परिस्थिति सिर्फ़ हमारे ख़ुद के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से नहीं जुड़ी है बल्कि यह हमारे सामाजिक स्वास्थय के लिए भी उतनी ही सच है. जब भी हम किसी बड़ी दुर्घटना या हादसे से गुज़रते हैं तो, ये हादसा हमारे नर्वस सिस्टम पर, कुष्ठ रोग वाले बैक्टिरिया की तरह ही प्रहार करता है और हम बिलकुल सुन्न हो जाते हैं. फिलहाल कोविड महामारी हमारे लिए इसी कुष्ठ रोग वाले बैक्टिरिया की तरह काम कर रही है.

इस अवधारणा की खोज मनोचिकित्सक डॉक्टर रॉबर्ट जे लिफ्टन ने की थी. लिफ्टन ने जापान के हिरोशिमा में हुए परमाणु बम के हादसे के बाद वहां के लोगों में यह मानसिक सुन्नता देखी थी. उनका कहना था कि जब पूरी संस्कृति या समाज किसी भयानक हादसे के कारण सिकुड़ जाता है और उस हादसे के बारे में बात नहीं कर पाता है तो उसे मानसिक सुन्नता कहा जा सकता है.

मनोवैज्ञानिक पॉल स्लोविक ने कहा था कि जितना ज़्यादा दर्द होता है, उतना ही उस दर्द को महसूस करने की और जूझने की हमारी क्षमता कम होती है. उनके अनुसार जड़ता इसलिए आती है क्योंकि दर्द का प्रमाण इतना ज़्यादा बढ़ जाता है कि हम घबरा जाते हैं.

दर्द की राजनीति

कोविड की दूसरी लहर जब शहर-दर-शहर लोगों के जीवन में उथल-पुथल मचा रही थी, वहीँ ‘सकारात्मक’ शब्द के साथ अजीबो-ग़रीब और ग़लतबयानी की खबरें सुनाई देने लगीं. टीवी न्यूज़ चैनल, अख़बार, सोशल मीडिया के ज़रिए सकारात्मक ख़बरों को बढ़ावा दिया जाने लगा. इसका उद्देश्य असल दर्द से लोगों का ध्यान भटकाना था.

कोविड से होने वाली मृत्यु की ग़लत संख्या बताना, सार्वजनिक स्वास्थ व्यवस्था की बदइंतज़ामी के बारे में चुप्पी साधे रखना जैसे तमाम फेक या झूठी ख़बरों के ज़रिए जनता को बरगलाने की कोशिश अभी भी जारी है. इनका उद्देश्य है कि, लोग जिस स्थिति और दर्द से गुज़र रहे हैं उसके बारे में वे चुप रहें. दर्द से मुंह मोड़ लेने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है. बल्कि ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद और पितृसत्ता की बुनियाद ही लोगों के दर्द को नज़रअंदाज़ करने पर टिकी है. न केवल हाशिए पर धकेल दिए गए लोग, बल्कि उनका दर्द भी जो ख़ुद इस व्यवस्था को चलाने में भागीदार हैं. व्यवस्था हमारी सामाजिक सुन्नता पर चलती है.

northlandscapes- image credits - Jan Erik Waider

इसे समझने के लिए ज़्यादा दूर भी नहीं जाना पड़ता. हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही जब हम किसी दर्द से गुज़र रहे होते हैं तो लोग कहते हैं ‘हिम्मत रखो, या ‘उसे बहादुरी और मज़बूती से उस दर्द को झेलना चाहिए’, या ‘इतनी सी बात का इतना बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए’. ऐसे जवाब अक्सर दर्द को पहचानने से इंकार करने, उसे नज़रअंदाज कर, उससे भागने की प्रवृति से निकलकर आते हैं. हम इस दर्द को दूर करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने को तैयार ही नहीं होते. 

लोगों की बात छोड़ भी दें, यदि हम अपने आप को ही थोड़ा परखें तो साफ़ नज़र आता है कि हम अपने आप को, और अपने शरीर के दर्द को भी कुछ ऐसे ही जवाब देते हैं. लेकिन, दर्द को दबा देने से वह चला नहीं जाता. वह दूसरे रूप में लौटता है. और हमारे अंदर एक युद्ध चलता रहता है. हम दर्द से ध्यान भटकाने के लिए कहीं और ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं. हम खान-पान की चीज़ों से अपना दिल बहलाते हैं या अपने अंदर अलगाव की भावना को बढ़ावा देते हैं. क्रोध, निराशा, घृणा, अंधभक्ति, और आत्ममुग्धता जैसे तमाम लक्षण हमें यही बताते हैं कि कहीं कोई दर्द है जिसे देखा और सुना नहीं जा रहा है, और जो रूप बदल कर इस तरह अपने आप को व्यक्त कर रहा है. इस तरह हम दर्द की चक्रव्यूह में और गहरे फंसते चले जाते हैं.

लेकिन, जिस पल हम अपने दर्द का सामना कर उसे निडर होकर व्यक्त करते हैं, ठीक उसी पल उसकी शक्ति ‘सब ठीक है’ के धोखे के जाल को चीरकर रख देती है. इसलिए अपने दर्द को स्वीकार करने और उसे व्यक्त करने का कौशल और साहस बहुत महत्त्वपूर्ण है. जब हम हमारे अपने दर्द के, या अपने आस-पास, समुदाय या संगठन के तमाम लोगों के दर्द के गवाह बनते हैं तो इस दर्द का साधारणीकरण हो जाता है और हम एक साझा समझ और संवेदना के स्तर पर एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं. इस प्रक्रिया में दर्द का नक़्शा एक सहयात्री की तरह है. हमारी सुन्नता के पिंजरे को तोड़ कर, इन नक्शे के माध्यम से हम अपने और सामूहिक दर्द की एक व्याख्या तैयार कर सकते हैं, जो इस दौर के चले जाने के बाद भी हमारी सामूहिक स्मृति में ताज़ा रहे, और जिसका सत्कार कर के हम यह कभी न भूलें कि हम पर क्या बीती थी और किन कारणों की वजह से ऐसा हुआ था.

धूप को आने दो

सर्दियों में ठंड के मारे शरीर सुन्न हो जाता है. तब हम धूप में बैठकर शरीर को गर्माहट देते हैं. पिछले डेढ साल से हमारे आसपास चकरी की तरह एक के बाद एक घटनाएं हो रही हैं. ये घटनाएं हमारे ऊपर अपना असर छोड़ रही हैं. ये हमें भीतर से सुन्न कर रही हैं. ज़रूरत है हमारी मानसिक सुन्नता को धूप में लाने की. ऐसा करने के करोड़ों तरीके हो सकते हैं. हम ज़िंदा रहने के लिए अपनी तरकीबें ढूंढ लेते हैं. उसी तरह हम शोक मनाने, और अपने अंदर के घावों को भरने की तरकीबें भी ढूंढ सकते हैं. महत्त्वपूर्ण यह है कि बिना दर्द को स्वीकार किए, उसकी दवा नहीं की जा सकती. क्या हम अपने शरीर और मन के लिए वह जगह बनाएंगे जहां हम उसकी दवा कर सकें?

किसी अपने को दर्द झेलते देखने का दर्द, ज़रुरत के समय में अपनों का साथ न दे पाने का दर्द, किसी को खोने का दर्द, आसपास हो रही घटनाओं का दर्द, किसी अनजान के दर्द की कल्पना करने का दर्द. वे तमाम दर्द जो हम महसूस तो कर रहे हैं लेकिन बयान नहीं कर पाते, सभी इस समय के दर्द की सूची में शामिल हैं. इन्हें महसूस कर, साझा करना दरअसल हमारे ख़ुद के स्वास्थ्य और एक समुदाय के सामूहिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत आवश्यक हैं.

अपनी किताब ‘द फारअवे नियरबाई’ में लेखक रेबेका सॉलनीत लिखती हैं कि यदि दर्द हमारे शरीर की सीमाएं तय करता है, तो जब हम अपने अलावा दूसरों का दर्द महसूस करते हैं तब हमारी सीमाएं और विशाल हो जाती हैं. हम एक तरह से ‘सामूहिक शरीर’ का हिस्सा बन जाते हैं. दरअसल, यही वो भावना थी जिसके आधार पर देश भर में लोग सक्रिय हो कर राहत के काम में लग गए थे.

इससे निकलने वाली ऊर्जा ने हमारे भीतर सुन्न पड़े हिस्सों के लिए धूप का काम किया. उनमें वापस गर्माहट भर दी. 

इस तरह की कार्यशाला का यही मकसद है. जो हम कर सकते थे, हमने किया. लेकिन ऐसी हज़ारों चीज़ें थीं जिन्हें हम करना चाहते थे, लेकिन नहीं कर पाए, और उस दर्द की सामूहिक स्वीकृति से भी शायद एक और ऊर्जा निकल सकती है जो हमें कुछ कदम और ज़िन्दगी के पास ले आए.

कार्यशाला

हमारा शरीर हमेशा हमसे बात करता है. शिशु अवस्था में, जब हमारी ज़रूरतों और एहसासों को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे तब हम शरीर के माध्यम से ही उन्हें व्यक्त करते थे. हमारा काम सिर्फ़ इतना है कि हम शरीर की इस आवाज़ को सुनना सीखें, जो कई बार एक छोटे बच्चे की तरह ही लगती है.

l. बॉडी स्कैन

यह कार्यशाला एक ऐसा अवसर है जहां हम शरीर के साथ थोड़ा वक़्त बिताते हैं और शरीर में जमा हो रहे दर्द को बाहर आने का और हमसे बात करने का अवसर देते हैं. यह सरल एक्टिविटी ध्यान केंद्रित करने, हमें शांत करने और शरीर को और गहराई से देखने में मदद करती है. इसे करने के बाद अपने आप से कुछ ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं जैसे – शरीर के कौन से हिस्सों में रौशनी आसानी से पहुंच रही थी? और कहां नहीं? शरीर के किस हिस्से में क्या महसूस हो रहा था? ये सभी सवाल अपने शरीर को और बेहतर समझने के नए रास्ते खोलते हैं.

ll. दर्द का नक्शा: बाहर

हम जहां है वहां से शुरुआत करते हुए, एक अपने आस-पास की जगहों का एक नक्शा बनाएं. जिस सत्र का ज़िक्र ऊपर के लेख में किया गया है, उस सत्र में हमने मोहल्ले का नक्शा बनाया था. मगर ज़रूरी नहीं है कि आप भी केवल मोहल्ले तक ही सीमित रहें. आप अपना नक्शा एकदम निजी भी बना सकते हैं जैसे अपने घर के अंदर का नक्शा. और इसे विस्तार भी दे सकते हैं जैसे पूरे शहर का नक्शा. हर एक नक़्शे की अपनी प्रतिक्रिया होगी और अलग-अलग तरह के विचार सामने आएंगे.

यदि यह कार्यशाला किसी समूह के साथ की जा रही हो, जहां सभी लोग एक ही गांव या शहर से हों, तो एक साथ मिल कर ऐसी जगहों की पहचाना की जा सकती है जहां दर्द का अनुभव होता है. एक साथ करने से सभी को अपने-अपने अनुभवों के बारे में बात करने का अवसर मिलेगा और साथ ही कुछ चर्चा भी की जा सकती है.

lll. दर्द का नक्शा: भीतर

हमारे शरीर के भीतर के दर्द का नक्शा बनाने के लिए, किसी कागज़ पर शरीर की रूपरेखा बनाएं (जैसी यहां बनाई गई है) और उसपर ऐसी जगहों पर बिंदु बनाएं जहां शरीर में दर्द का अनुभव हो रहा है. शुरुआत में की गई बॉडी स्कैन एक्टिविटी से जो शरीर के साथ का जुड़ाव बना है उसका उपयोग करें. 

इस नक़्शे का काम है हमें शरीर के दर्द को देखने और व्यक्त करने में मदद करना. भीतर हो रहे दर्द को अपने बाहर देख पाना अपने आप में एक अनोखा अनुभव है, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो अपने शरीर के दर्द पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते और अपने आप से कहते रहते है “मैं ठीक हूं!”

lV. खुले मन से लिखना

यह सारे क्रियाकलाप समूह और एकल दोनों ही तरह से किए जा सकते हैं. यदि यह समूह में किए जाएं तो एक्टिविटी के बाद साथ बैठकर उनपर बात करना सुखद होता है. लेकिन, यदि आप इसे अकेले कर रहे हैं, या समूह में ही इसे करते हुए कुछ ऐसी चीज़े मन में आ जाएं जिन्हें सभी के साथ साझा करना संभव नहीं, तब आप थोड़ा समय लेकर किसी अलग जगह पर बैठकर, अपने ख़्यालों को कॉपी में लिख सकते हैं या अपने फ़ोन पर वॉइस रिकॉर्ड कर सकते है. इससे अंदर चल रहे विचारों को बाहर आने का अवसर मिलेगा. इस तरह हम खुद अपने ख़्यालों के गवाह बन सकते हैं.

कई बार बिना अपने आप को रोके या टोके, जो भी अंदर चल रहा है उसे बस लिख देने से कई ऐसी चीज़ें सामने आ जाती हैं जो हमने पहले उस तरह से नहीं सोची थीं. अगर समझ नहीं आ रहा है क्या लिखें तो किसी ऐसे वाक्य से शुरू करें जैसे “मेरे शरीर के इस भाग में दर्द है क्योंकि….” लेकिन उसके बाद अपने मन को खुला छोड़ दीजिए और अपनेआप को अपने शरीर की कहानी बताने और सुनने दीजिए. शुरुआत में ऐसा भी महसूस हो सकता है कि जो लिख रहे हैं इसका कोई मतलब नहीं बन रहा, लेकिन यह ठीक है. इसमें कुछ सही या ग़लत नहीं होता. बस अंदर चल रहे ख़्यालों को बाहर व्यक्त करना होता है. इस प्रक्रिया में कई बार कुछ ऐसी चीज़ें सामने आ जाती हैं जो हमें चौंका देती हैं या अपने ही किसी अनजान पहलू से हमें रूबरू करवाती हैं.

संचालक के लिए कुछ टिप्पणियां

इन एक्टिविटीज़ को कई बार किया जा सकता है. मुमकिन है कि हर बार एक अलग मंच तैयार हो और कुछ नया निकलकर बाहर आए. या रूककर कुछ समय बाद फिर से करने में आपको या समूह को किसी नई चर्चा की गहराई में जाने का अवसर मिले. इस खोज में आपकी जिज्ञासा ही आपकी सबसे भरोसेमंद साथी है.

ध्यान रहे कि यह क्रियाकलाप डॉक्टरी जांच का विकल्प नहीं हैं. यदि आपके शरीर में दर्द या किसी और तरह के लक्षण है जो किसी खतरनाक बीमारी या किसी ख़ास परिस्थिति की वजह से हो रहे हैं तो उसके लिए डॉक्टर से दवाई लेना अनिवार्य है. इन गतिविधियों को तब ही किया जा सकता है जब शरीर को कोई और ख़तरा न हो. शरीर की बात सुनने का मतलब यह भी है कि जब वह परेशानी के कोई लक्षण दिखाए तब डॉक्टर से फौरन सलाह लें.

समूह के साथ इस तरह के सत्रों में कभी कुछ ऐसी चीज़ें भी बाहर आ सकती हैं जो प्रतिभागी के लिए मुश्किल हों और किसी गहरे दर्द या घटना के बारे में बात करती हों. ऐसी परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि उस प्रतिभागी को अपनी बात रखने की जगह दी जाए और उसपर किसी भी तरह की टिप्पणी न की जाए. अगर आपको लगता है कि प्रतिभागी को किसी तरह की मदद की ज़रुरत है, तो आप उससे अलग से इस बारे में बात कर सकते है. यह भी संभव है कि कई बार व्यक्ति को जिस प्रकार की मदद की ज़रुरत होती है वह आसपास उपलब्ध ही न हो. इन परिस्थितियों में प्रतिभागी को यह अहसास दिलाना की उसका दर्द जायज़ है और वह उस दर्द में अकेला नहीं है, यह अपनेआप में एक बड़ी बात हो सकती हैं. कई बार ऐसे सत्रों में जो चीज़ें हम अपने बारे में समझते और जानते हैं वे हमारी आगे की यात्रा की शुरुआत होती हैं. हो सकता है कि आप अपने प्रतिभागियों के साथ उनकी पूरी यात्रा में साथ न चल सकें, मगर यह ठीक है.

अपेक्षा एक स्वतंत्र अध्ययनकर्ता, थिएटर रचनाकार, और एक्टिविस्ट हैं. वे मुंबई में रहती हैं.

इस लेख का अनुवाद सुमन परमार ने किया है.

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