विशेष

मेकिंग टेक्स्ट्बुक फेमिनिस्ट: किताबों को नारीवादी बनाने की ओर

2005, में निरंतर संस्था ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के आग्रह पर बच्चों की पाठ्य- पुस्तिकाओं को ‘जेंडर संवेदनशील’ बनाने का काम किया था. निरंतर संस्था द्वारा तैयार की गई किताबें 15 साल से भारतीय स्कूलों में पढ़ाई जा रही हैं. इस साल 2022 में इनमें से जाति पर कुछ पाठ्यक्रमों को हटा दिया गया है.

फिल्मी शहर एपिसोड 3: सिनेमा में समलैंगिकता

इस मास्टरक्लास के दो भागों में – सिनेमा में समलैंगिकता – विषय पर बातचीत करते हुए फिल्म निर्देशक अविजित मुकुल किशोर ने सिनेमा की भाषा, सही एवं सम्मानजनक शब्दावलियों का अभाव, LGBTQI+ से जुड़े लोगों के संघर्ष एवं अपमान से पहचान की उनकी यात्रा को फिल्मी पर्दे पर उनकी प्रस्तुति के क्रम में देखने की कोशिश की है.

सेक्स [वर्क] एंड द सिटी

कोलकाता, एक ऐसा शहर जिसके आधुनिक स्वरूप में उसका इतिहास गहरे समाहित है. कोलकाता शहर के आकार को बनाने में उसके स्थान, उसके बंदरगाहों के माध्यम से लड़े गए युद्धों, सीमाओं के पार से आने वाले प्रवासियों और निश्चित रूप से, ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं लगातार बदलती उनकी नैतिकता और उसके प्रभाव की अहम भूमिका है.

फिल्मी शहर एपिसोड 2: जाति और सिनेमा

फिल्मी शहर के दूसरे एपिसोड ‘जाति और सिनेमा’ में हम, सिनेमा के ज़रिए हमारे आसपास की दुनिया की पड़ताल कर रहे हैं. हमारी कोशिश है बड़े पर्दे की सुनहरी दुनिया की परतों को उघाड़कर ये देखना कि हमारा सिनेमा जाति के सवालों पर क्या और किस तरह की बात करता है?

अंक 003 शहर

शहरों का सपना देखने वाले, शहर के भीतर रहने वाले और शहर को बनाने वाले – इन सभी के ज़रिए हम शहर को देखने का नज़रिया तलाश कर रहे हैं.

ब्लैक बॉक्स एपिसोड 2: पंडिता रमाबाई

ब्लैक बॉक्स के इस नए एपिसोड में रमाबाई का किरदार निभा रही कलाकार रिज़वाना फातिमा, हमें रमाबाई के जीवन के उन अहम हिस्सों से रू-ब-रू करवा रही हैं जिसे आज के समय में हम ज़्यादा गहराई से महसूस कर सकते हैं.

स्वास्थ्य से याद आया…

बिहार में अलग-अलग समूहों से जुड़ी महिलाओं ने ज़ूम वीडियो कॉल पर बात करते हुए स्वास्थ्य से जुड़े हर मुद्दे पर हमसे खुलकर बात की. कम्प्यूटर का सर्वर ख़राब होने की दिक्कत से लेकर स्वास्थ्य केन्द्रों के भूसा घर में तबदील हो जाने की दास्तान यही बताती है कि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करना अमूमन भूसे के ढेर में सुई खोजने के समान है.

मन के मुखौटे, एपिसोड 02: रहोगी तुम वही

मानसिक स्वास्थ्य के तयशुदा खांचे से बाहर निकल, उसे आप बीती और जग बीती के अनुभवों एवं कहानियों के चश्में से समझने की एक महत्वाकांक्षी पहल – मन के मुखौटे- के दूसरे एपिसोड में हम लेकर आए हैं कथाकार सुधा अरोड़ा की कहानी ‘रहोगी तुम वही’. सुनिए कैसे भावनात्मक हिंसा की छोटी-छोटी किरचें इस कहानी में साफ-साफ दिखाई देती हैं.

मन के मुखौटे, एपिसोड 01: अड़ियल दुख

जन स्वास्थ्य विशेषांक में इस हफ़्ते हम आंखें बंद कर अपने मन-मस्तिष्क के भीतर झांकने की कोशिश कर रहे हैं. पब्लिक हेल्थ एवं पॉलिसी पर अभी तक हम कई तरह के सवाल-जवाब कर चुके हैं. इस बार बारी है स्वास्थ्य और सिस्टम के बीच मानसिक स्वास्थ्य को परखने एवं समझने की.

नाकाम स्वास्थ्य व्यवस्था ने जनता को डाला क़र्ज़ में

स्वास्थ्य का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों में शामिल है. लेकिन आज़ादी के 75 साल बाद भी क्या स्वास्थ्य सुविधाएं सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं? इस वीडियो प्रस्तुति में चंबल मीडिया और द थर्ड आई टीम के साथ जानिए—क्या है जन स्वास्थ्य व्यवस्था और कर्ज़ में डूबते भारत का असल सच?

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