नौ लंबे महीने

सरोगेसी पर एक डॉक्युमेंट्री जो औरत के शरीर और उसके श्रम को लेकर ज़रूरी बहस की शुरुआत करती है.

नौ लंबे महीने

क्या एक महिला की कोख अपने घर परिवार को आगे बढ़ाने के अलावा कोई और भूमिका निभा सकती है? क्या उसकी कोख उसकी आजीविका का माध्यम भी बन सकती है?

निर्देशिका सुरभी शर्मा की डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘कैन वी सी द बेबी बम्प प्लीज़’ सरोगेसी की दुनिया को समझने का एक प्रयास है. सरोगेसी– जिसमें महिलाएं भ्रूण इंप्लांट के ज़रिए अपनी कोख को किराए पर देती हैं. हमारा पितृप्रधान समाज ऐसी कोख को, ऐसी महिलाओं को कैसे देखता है? और क्यों?

द थर्ड आई के साथ बातचीत में अपनी फिल्म का सफर साझा करते हुए, सुरभी एक औरत और उसका गर्भवती शरीर, प्रजनन और श्रम का रिश्ता और मां बनने के अलग-अलग माईनों पर रोशनी डालती हैं.

“वक्त बड़ी तेज़ी से दौड़ रहा है न… ये बड़ा रोमांचक है… क्या हसीना को भी ऐसा लग रहा है कि वक्त भाग रहा है?” फिल्ममेकर सुरभी शर्मा की फिल्म ‘कैन वी सी द बेबी बम्प प्लीज़’ के शुरुआती सीन में एक विदेशी दंपत्ती की उल्लास भरी आवाज़ हमें सुनाई देती है, जो कंप्यूटर के ज़रिए मीलों दूर बैठी एक महिला हसीना से यह सवाल पूछ रही हैं. हसीना, शायद यह उस महिला का असली नाम है, शायद नहीं. हसीना, जिसकी दुनिया उस दंपत्ति की दुनिया से बिल्कुल अलग है.

फिल्म के सीन से हमें यह आभास होने लगता है कि इस दंपत्ति की औलाद होने वाली है लेकिन इनके माता-पिता बनने का सफ़र ऐसे और आम अनुभवों से बिल्कुल अलग है. उनका बच्चा हसीना की कोख में है. हसीना उनकी सरोगेट है.

फिल्म में आगे बढ़ते हुए हम देखते हैं चार महिलाओं को या यूं कहें चार महिलाओं के आकारों को, क्योंकि उनका चेहरा छाया में है. ये महिलाएं सफेद, लोहे के बिस्तर पर एक कतार में बैठी हुई हैं. ऐसे बिस्तर जो हमें अस्पतालों की याद दिलाते हैं और अस्पतालों के गलियारों में बसी फिनायल की गंध की भी.

फिर चूड़ी की हल्की सी खनखनाहट सुनाई देती है. हम देखते हैं महिलाओं के हाथ, जो अधमरे से बिस्तरों के कोने से झूल रहे है, जैसे गर्मी की धूप में झूलसे हुए फूल.

इस कमरे में एक खिड़की है, जिससे हम बाहर रोज़मर्रा की चहल-पहल देख सकते है. एक ऐसी चहल-पहल जो इन सब महिलाओं से दूर, कहीं दूर किसी और दुनिया का हिस्सा हैं. और फिर हम देखते हैं एक महिला का फूला हुआ पेट, उसके नाइट गाउन से ढका हुआ. सब तरफ चुप्पी है, एक सन्नाटा. ऐसा एहसास होने लगता है कि शायद हसीना और उनकी हमजोलियों के लिए वक्त थम गया है. ये खिंच रहा है, एक लंबे, असाधारण धागे के जैसे. और उस वक्त का बोझ, ईंटों से भरे बोरे की तरह भारी. फिल्म का यह अंश लगभग डेढ़ मिनट लंबा है, पर ऐसा लगता है कि हम एक लंबी, काली सुरंग के अंदर चलते चले जा रहे हैं.

मातृत्व को लेकर अक्सर हम सबकी एक बनी बनाई धारणा है कि मां बनना एक औरत के लिए बहुत ही रूमानी, आदर्श और पूजनीय चीज़ है. पितृप्रधान समाज में प्रजनन महिलाओं के लिए प्रमुख है. उनकी सबसे ख़ास और तथाकथित ‘प्राकृतिक’ भूमिका. अगर औरत मां न बन पाए तो उसका कुछ अस्तित्व ही नहीं हैं. लेकिन एक सरोगेट की किराए पर ली गई कोख औरत और उसके शरीर से जुड़ी इन सब अवधारणाओं को चुनौती देती हैं.

भारत में सरोगेसी का उद्योग दो दशक पुराना माना जाता है और इसके ज़रिए अनुमानित सालाना लगभग 16,465 करोड़ रुपए का व्यवसाय होता है. इसे शायद विडबंना ही कहा जाएगा कि इस उद्योग की केंद्र बिंदु, एक सरोगेट महिला, बिल्कुल छुपी हुई है. वह कौन है, क्या करती है, कैसे रहती है, क्या सोचती है- ये सब कभी उभर कर नहीं आाता या आने नहीं दिया जाता.

सुरभी शर्मा की फिल्म हमें इस दुनिया की झलक दिखाती है जिसके बारे में हम शायद ही कुछ जानते हैं. यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इन सरोगेट महिलाओं के लिए प्रजनन एक श्रम है और उनकी कोख उनकी आजीविका का साधन.

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इस फिल्म पर काम करने से पहले भी सुरभी को एक गर्भवती महिला का शरीर बहुत दिलचस्प लगता था- “मैं एक बच्चा जनने वाले शरीर को लेकर काफी सोचती थी. एक ऐसी अवस्था जिसे एक तरह से परिवार की फोटो एलबम में भी जगह नहीं मिलती. ख़ासकर भारत में जहां गर्भवती महिला की फोटो खींचना अच्छा नहीं माना जाता. इसे अपशगुन माना जाता है और गर्भवती महिला भी हमेशा अपने गर्भ को छुपाती है, दिखाती नहीं … इसे छिपाने की चीज़ समझती है”.

सुरभी ने अपनी गर्भावस्था का अनुभव याद करते हुए बताया कि उस समय वे अपने खुद के शरीर को लेकर काफी जिज्ञासा से भरी हुई थी. इसलिए जब सालों बाद ‘समा – रिसोर्स सेंटर फॉर वीमेन एंड हैल्थ’ ने उनसे फिल्म के ज़रिए सरोगेट महिलाओं की दुनिया को टटोलने के लिए कहा तो सुरभी बहुत उत्साहित हुईं.

“मेरे लिए यह एक स्वाभाविक सा पड़ाव था… अपनी गर्भावस्था से शुरू होकर इन महिलाओं के गर्भ के बारे में विस्तार से सोचना.“

लेकिन इन महिलाओं तक पहुंच पाना आसान नहीं था.

“मैंने अपने एक्टिविस्ट और पत्रकार दोस्तों से संपर्क किया और पूछा कि क्या वे सरोगेट महिलाओं को जानते हैं या क्या उन्हें ऐसे इलाकों के बारे में पता है जहां क्लीनिक के लोग कोख किराए पर देने वाली महिलाओं की तलाश में रहते हैं. मैंने बहुत लोगों से संपर्क किया, कई जगह ढूंढा लेकिन कहीं कोई सुराग नहीं मिला. ज़ाहिर था कि लोग सरोगेसी को लेकर खुलकर बात नहीं करना चाहते हैं. ये हमेशा गुप्त रखा जाता है.“

सरोगेसी का मतलब है कि मां बनने की प्रक्रिया को घर की चारदिवारी से बाहर ले आना. अपनी कोख का बाज़ार के नियमों के अनुसार नापतोल करना. पर जैसे ही प्रजनन के श्रम की कीमत लगाई जाती है, गर्भवती महिला को कंलकित किया जाता है और उसे समाज संदेह की नज़र से देखने लगता है. जैसेकि उसने कोई बहुत घिनौना काम किया हो.

हमारे समाज में औरत के साथ शायद यह हमेशा होता आया है. जब भी वह घर की चौखट लांघ कर बाहर आती है, अपने शरीर को मां, बहन, बेटी इन परिभाषाओं के दायरों से परे एक रूप देने की कोशिश करती है तो उसे और उसके श्रम को तिरस्कृत किया जाता है.

“क्लीनिक सरोगेट को यह बार-बार बताते हैं कि उन्हें अपना काम दुनिया से छुपाकर रखना है.“ हमें इस दुनिया से रूबरू कराते हुए सुरभी कहतीं हैं.

“वे (क्लीनिक) उन्हें कहते हैं कि अगर तुमने इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात की तो लोग तुम्हारी तुलना यौनकर्मियों से करेंगे. एक तरफ़ वे इन औरतों को बताते हैं कि वे किसी की मदद कर रही हैं और दूसरी तरफ़ वे साफ़ इशारा कर रहे होते हैं कि लोग उन्हें यौनकर्मी समझ कर उन्हें ज़लील करेंगे. इसलिए बेहतर यही रहेगा कि वे इस बारे में किसी से भी बात न करें.”

“इसके बारे में किसी से न बात करने का क्या मतलब है”, सुरभी ने समझाया, “क्लीनिक महिला से संबंधित सभी काग़ज़ों और दस्तावेज़ों को अपने पास ही रखती है. कल को अगर किसी महिला को स्वास्थ्य संबंधी कोई परेशानी आती है, तो उस महिला के पास यह साबित करने लायक़ कोई दस्तावेज़ नहीं होगा कि उसकी दिक्कत का संबंध सरोगेसी से है. मैं क़रीब सात-आठ महिलाओं से मिली, जिनके पास प्रसव के बाद ली जाने वाली दवाइयों के नुस्ख़े के अलावा कोई और काग़ज़ ही नहीं था. लेकिन मुझे लगता है जो महिलाएं सरोगेसी का काम करती हैं वे इसे केवल एक काम के रूप में देखती हैं. उनके लिए यह काम एकमुश्त कुछ पैसे कमाने का एक ज़रिया भर है. इसलिए सेरोगेसी से उनका रिश्ता बिलकुल साफ़ है. लेकिन, इसे इस तरह से देखने के लिए कोई तैयार नहीं.”

सुरभी ने याद किया कि जिन सरोगेट औरतों से वे मिलीं उनमें अधिकांश कपड़ा उद्योग में काम करने वाली औरतें थीं. सरोगेसी के लिए दी जाने वाली बड़ी रक़म समय-समय पर एकमुश्त मिलती है, इसलिए इस पैसे को मकान आदि ख़रीदने में निवेश किया जा सकता है. सुरभी को यह भी लगा कि बहुत सी औरतें सरोगेसी को “शुद्ध रोज़गार” के रूप में ही देखती हैं.

इस कमाई पर उनका सीधा नियंत्रण है या नहीं? उनके घरवालों का किस हद तक उनकी कमाई पर हक रहे या नहीं- ये सवाल अपने आप में बहुत उलझे हुए हैं और शायद इन सब का सीधा-सीधा जवाब मुमकिन भी नहीं है. पर एक बात साफ़ है – इस उद्योग से जुड़े सभी लोग यह अपेक्षा रखते हैं कि एक सरोगेट महिला बिल्कुल पेशेवर की तरह व्यवहार करेगी. मतलब, उसके प्रर्दशन और ‘पैदावार’ से ही यह तय होगा कि उसका कितना मुआवज़ा दिया जाना चाहिए. उनसे यह सब उम्मीद तो है, पर बिना किसी अधिकार या सुरक्षा कवच के.

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फिल्म में एक मेडिकलकर्मी यह बताते हैं कि कैसे (और क्यों) एक सरोगेट को पेशेवर व्यवहार करना ज़रूरी है वे कहते हैं – “उन्हें दी जाने वाली एकमुश्त रक़म सबसे आख़िर में दी जाती है. सोनोग्राफ़ी और चेक-अप के बाद ही उनका भुगतान किया जाता है. उन्हें पता होता है कि अगर नतीजा ठीक नहीं आया तो शायद उनका अगला भुगतान हफ़्ते भर के लिए टल सकता है. इसलिए, वे अपना ख़याल रखती हैं.

यह केवल किश्त या अतिरिक्त भुगतान का सवाल नहीं है…उनको लगता है, ‘मुझे अपने पर काम करना है और मेरा अगला भुगतान अगली सोनोग्राफ़ी में अटका है.’

लेकिन गर्भ धारण के दौरान या बाद में किसी क़िस्म का स्वास्थ्य संकट आने पर क्लीनिक की उनके प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती. असल में, अगर किन्हीं कारणों से गर्भ गिर जाता है तो अक्सर क्लीनिक उन्हें कोई पैसा नहीं देता.

सुरभी ने बताया कि “अगर किसी क्लीनिक ने महिला को सरोगेसी के अंत में तीन लाख रुपए देने का वादा किया है और अगर क्लीनिक 20-25 लाख या कभी-कभी 50 लाख रुपए, बच्चे की मांग रखने वाले मां-बाप से चार्ज करता है. तो सरोगेट को उसमें से केवल तीन लाख देना कैसे तय किया गया? कोई इसे लेकर बात नहीं करना चाहता कि यह रक़म किस आधार पर तय की गई है.

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कोई भी मेडिकल इंश्योरेंस की बात नहीं कर रहा. कोई इस बारे में भी बात नहीं कर रहा कि क्लीनिक को इसका व्यवस्थित रिकार्ड रखना चाहिए; कि फ़लां महिला इस साल में सरोगेट बनी थी और यह भी कि पांच साल बाद उसके स्वास्थ्य पर कैसा प्रभाव पड़ेगा. इस संबंध में किसी क़िस्म के दस्तावेज़ नहीं रखे जाते, न ही इस पर नज़र रखी जाती है. यह ऐसा है जैसे आपने बाज़ार में नई दवाई जारी की और अगर छः साल बाद लोगों को उसकी वजह से माईग्रेन (सर दर्द) होना शुरू हो जाता है तो इसकी ज़िम्मेवारी या जवाबदेही किसकी होगी? अपनी फ़िल्म बनाते वक़्त यह सारे प्रश्न मेरे सामने स्पष्ट हुए.”

क्योंकि उद्योग में काम करने वाली सरोगेट महिलाओं को अक्सर गोपनीय रखा जाता है, सुरभी इस बात से अचंभित नहीं थी कि जिन महिलाओं से उनकी मुलाक़ात हुई थी वे कैमरे के सामने नहीं आना चाहती थीं.

सुरभी ने बताया कि “यह इत्तेफ़ाक ही था कि एक महिला, जिसकी आवाज़ आप फ़िल्म में सुनते हैं, ने कैमरे के सामने आना स्वीकार किया. इसकी वजह थी कि सरोगेसी के दौरान उनका गर्भ गिर गया था. इसलिए एक तरह से उसे इस उद्योग से निकाल-बाहर कर दिया गया था.

वह इसलिए भी बात करने के लिए तैयार हो गईं क्योंकि उन्हें पता था कि वह दोबारा सरोगेट नहीं बन पाएंगी. उनका सारा पैसा इसलिए काट लिया गया था क्योंकि उनके अनुसार वह गर्भ धारण के दौरान अपने घर चली गईं थीं, जिसके कारण गर्भ गिर गया,” उन्होंने कहा कि

“बाक़ी महिलाएं मुझसे बात ही करना नहीं चाहती थीं, वे अपने चेहरे नहीं दिखाना चाहती थीं. शायद इसलिए कि वे दोबारा सरोगेट बनना चाहती हों. एजेंट उन्हें यह कहकर हर वक़्त डरा के रखते हैं कि चारों तरफ़ मीडिया के लोग घूमते रहते हैं, इसलिए किसी से इस बारे में बात मत करो.”

फ़िल्म इन्हीं धुंधले चेहरों और उनकी आवाज़ों से बुनी गई है, लेकिन फिर भी उनकी मौजूदगी का एहसास लगातार बना रहता है. उनका तिरस्कृत श्रम सिर्फ़ चंद शब्दों के ज़रिए ही बयान होता है. वे ही इस फ़िल्म को बनाती हैं, तब भी वे हमारी पहुंच से बाहर रहती हैं, हमारी नज़रों से छिपी हुई.

बेशक बतौर दर्शक हमने उन्हें सरसरी तौर पर ही देखा हो, लेकिन सुरभी ने सरोगेट महिलाओं के सफ़र को नज़दीक से देखा है. सुरभी ने बताया कि भ्रूण आरोपित किए जाने के बाद सरोगेट महिला को क्लीनिक द्वारा मुहैय्या करवाई गई जगह पर ही रहना होता है. “इसके बाद वह अपने घर भी नहीं जा सकती, उसे घर जाने की इजाज़त नहीं दी जाती.”

इस बारे में बताते हुए सुरभी का चेहरा तमतमा गया, “वे नौ महीने तक एक ही जगह में रहती हैं, बिल्कुल कैदियों के जैसे. आज इतने साल बाद भी सरोगेट के जीवन के इस हिस्से के बारे में बात करते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं”.

क्लीनिक द्वारा कभी-कभी कोई बिल्डिंग या ‘चॉल’ किराए पर ले ली जाती है जहां सारी महलाओं को एक साथ रहना होता है. पांच-छः महिलाएं, एक कमरे में ठूंस-ठूंस कर नौ लंबे महिने बिताने के लिए मजबूर की जाती हैं. ज़ाहिर है ये सब पैसे बचाने की नियत से किया जाता है.

इन महिलाओं की कोख में पल रहे बच्चे को सुरक्षित रखने के नाम पर उन्हें कैदियों की तरह रखने के लिए कई तरह के तर्क गढ़े जाते हैं.. हां, पर इतना है कि उनके घर परिवार वालों को उनसे कभी-कभार मिलने की इजाज़त होती है.

(सुरभी की फ़िल्म में हमें जो साफ़ सुथरे अस्पताल जैसे वार्ड दिखाई देते हैं, उन्हें लगता है वे सब वास्तव में क्लीनिक द्वारा फ़िल्म के लिए तैयार किए गए होंगे. उनके अनुसार यह मुमकिन भी है और नहीं भी. एक ऐसे संदर्भ में जहां इतना कुछ पर्दे के नीचे छिपा है यह कहना मुश्किल है कि क्या सच है और क्या झूठ).

नौ महीनों तक सरोगेट सख़्त मेडिकल निगरानी में रहती है ताकि मनचाहा, सफल प्रसव अंजाम दिया जा सके. यह महिलाओं की वास्तविकता के अनुभव के बिल्कुल उलट है.

फ़िल्म में एक औरत बताती है कि कैसे उसकी अपनी ख़ुद की गर्भावस्था के दौरान प्रसव पीड़ा होने पर उसने एक अस्पताल में भर्ती होने की कोशिश की. लेकिन उसे बताया गया कि वह समय से पहले आ गई है और अस्पताल कर्मचारियों ने उसे वहां से भगा दिया.

“…नर्स ने मुझे दो-तीन थप्पड़ मारे और मुझे कमरे से बाहर निकाल दिया. मैंने उससे बहुत विनती की क्योंकि मुझे पता था कि मुझे किसी भी वक़्त बच्चा होने वाला है…लेकिन उसने मुझसे कहा कि अभी मेरे पास दो दिन का समय और है. उसने मुझे वहां से चले जाने को कहा. ‘आपने बिस्तर क्यों घेर रखा है? भगवान ही जानता है कि इतने लोग यहां कहां से आए!’ उसने मुझे कमरे से बाहर निकाल दिया. रोते हुए मैं सीढ़ियों पर ही बैठ गई और मैंने अपने बच्चे को वहीं जन दिया.”

सरोगेट के समानंतर संसार में हालांकि स्वास्थ्य को ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है. फ़िल्म के एक और दृश्य में महिलाएं बैठकर चुहल कर रही हैं कि कैसे उन्हें:

“…इतना सारा खाना पसंद नहीं. लेकिन हमारे पास कोई चारा भी नहीं है. हमें अपना वज़न बढ़ाना होता है. यह बिस्कुट कितना सूखा-सूखा सा है. लेकिन यह हमारे लिए नहीं, बल्कि बच्चे के लिए है.”

वे बताती हैं कि उन्हें ज़्यादा पैसा मिलता है, अगर बच्चे का वज़न संतोषजनक रूप से ज़्यादा हो,

हमें दस हज़ार रुपए ज़्यादा मिलेंगे, अगर बच्चे का वज़न चार किलो निकले. वे इस बारे में भी मज़ाक़ करती हैं कि कैसे उन्हें वज़न बढ़ाना चाहिए…एक किलो तो गाउन में छिपाया जा सकता है या वज़न लेते समय हमें अपने गले में पत्थर टांग लेने चाहिए!

सुरभी ने सरोगेट महिलाओं के ख़ुद के गर्भधारण और फ़र्टिलिटी क्लीनिक में स्वास्थ्य निश्चित तौर तरीके के हिसाब से चलने के अनुभवों के बारे भी बताया.

“मेरे लिए एक बात तो साफ़ थी कि जो औरतें सरोगेट की भूमिका निभाने आती हैं उनके पास प्रायः अपने जीवन में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होती. लेकिन एक बार जब महिला सरोगेट बन जाती है तो अचानक उसके जीवन में मेडिकल प्रक्रियाएं बहुतायत में आ जाती हैं. उसकी अपनी महत्ता उससे पूरी तरह से छीन ली जाती है.”

उसके स्वास्थ्य पर कड़ी नज़र रखी जाने लगती है: ढेरों अल्ट्रासाउंड, गर्भस्थ शिशु की धड़कनों पर नज़र, सीज़ेरियन डिलीवरी पर ज़ोर, इत्यादि. ये ऐसे फ़ैसले होते हैं, जिन पर अधिकांश समय उसका अपना कोई इख़्तियार नहीं होता.

फ़िल्म में एक सरोगेट, जिसका बीच में ही गर्भ गिर जाता है, दिल छू जाने वाले अंदाज़ में साफ़-साफ़ कहती है: “यह किसी और का बच्चा था, इसलिए डॉक्टरों ने मेरा इतना ख़याल रखा. इसमें सिर्फ़ कोख मेरी थी, बीज किसी और का था. इसलिए जिसका वे ध्यान रख रहे थे, वह उनका अपना था.”

सरोगेट और उसकी कोख के बीच क्या संबंध है? “अधिकांश क्लीनिक इस विचार को अमानवीय बना देते हैं,” सुरभी ने कहा. “वे सरोगेट मां को एक बार भी बच्चे की शक्ल तक नहीं दिखाते. उनकी नज़र में वे नहीं चाहते कि बच्चे की शक्ल देखने से सरोगेट मां के मन में बच्चे के प्रति प्यार की भावना उमड़े. इसलिए उनकी माने तो वे जन्म देने वाली मां को सदमे से बचा रहे होते हैं.” और साथ-साथ वे अपने हितों की भी रक्षा कर रहे होते हैं, क्योंकि अगर सरोगेट मां के दिल में बच्चे के लिए एक बार प्यार उमड़ पड़ेगा, तो हो सकता है वह उसे देना ही न चाहे और इसको लेकर तमाम क़ानूनी लफड़े खड़े हो जाएं. हालांकि यह सब कोरी बकवास है, क्योंकि करारनामा इस बारे में बिलकुल स्पष्ट होता है.

इसके अलावा सरोगेट ख़ुद यह कहते हैं कि: “हम और बच्चों का लालन-पालन नहीं कर सकते. हम यह सब बच्चे के लिए नहीं कर रहे थे. लेकिन हमने अपने शरीर के अंदर बच्चे को नौ महीनों तक पाला है तो क्यों फिर हम एक बार उसकी शक्ल तक नहीं देख सकते…इससे किसी को क्या नुक़सान हो सकता है?”

यह अलगाव महिला को गहरे तक आघात पहुंचाता है और वे इसके बारे में बेहद संजीदगी से बात करती हैं. वे बार-बार इस बात पर ज़ोर देती हैं कि उन्हें बच्चा नहीं चाहिए; कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि बच्चे को उनसे बेहतर जीवन नसीब होगा, लेकिन उन्हें कम से कम एक बार यह तो देखने देना चाहिए कि बच्चा दिखता कैसा है.”

सुरभी ने बताया कि फ़िल्म निर्माण के वक़्त उनके लिए सरोगेसी को लेकर “श्रम” के पहलू को नज़रंदाज़ करना नामुमकिन था. और जबकि मेडिकल नैतिकता के सवाल को संबोधित करना बेहद ज़रूरी है, लेकिन सबसे पहले सरोगेट बनी महिला को श्रमिक का दर्जा दिलाना भी उतना ही ज़रूरी है; उसे एक उपयोगी इंसान के रूप में उसकी मुनासिब ज़रूरतों की भरपाई और उचित मुआवज़ा दिया जाना भी उतना ही ज़रूरी है; तथा उसे सप्लाई चेन में एक चलताऊ पुर्ज़ा न समझा जाए, बल्कि उसके अधिकारों और ज़िम्मेवारियों को प्राथमिकता दी जाए. इन्हीं सब कारणों से हाल ही में सरोगेसी (रेगुलेशन) विधेयक [Surrogacy Regulation Bill] पेश किया गया है, जो व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने की पेशकश करता है और केवल परोपकार के मक़सद से की जाने वाली सरोगेसी को ही मान्यता प्रदान करता है. लेकिन इस विधेयक से उसे निराशा ही हुई है.

विधेयक कथित तौर पर फ़र्टिलिटी मार्केट में सरोगेट एवं कमीशनिंग पेरेंटस के शोषण को रोकने का दावा करता है. यह विधेयक सभी व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता है और केवल परिवार के भीतर ही परोपकार के मक़सद से की जाने वाली सरोगेसी की ही अनुमति देता है.

सुरभी के अनुसार,

यह विधेयक हर संभव तरीक़े से सरोगेसी के श्रम के पहलू को नज़रंदाज़ करता है. कल्पना करें कि आप परिवार में सबसे छोटी बहु हैं और पूरा परिवार यह फ़ैसला लेता है कि आप अपनी जेठानी के लिए सरोगेट बनेंगी. ऐसी परिस्थिति में आपके पास परिवार के दबाव के चलते उनकी बात मानने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं बचता. और यह मैं सबसे बेहतरीन स्थिति की बात कर रही हूं. यहां पर “नक़द मुआवज़े” के पहलू को बीच से बिलकुल हटा दिया गया है.

अर्थात्, सरोगेट बनने वाली महिला के पास इसके ज़रिए पैसा कमाने की जो थोड़ी-बहुत मर्ज़ी थी, आपने उससे वह भी पूरी तरह से छीन ली. महिला के मेडिकल बीमे जैसी बातें तो अभी बहुत दूर की कौड़ी हैं. इस तरह हम देखते हैं कि इस विधेयक से महिला को भारी नुक़सान ही होने वाले वाला है.”

बार-बार वही सवाल अपने को दोहराते हैं. महिला के प्रजनन श्रम का मूल्यांकन कौन तय करता है: समाज, परिवार, फ़र्टिलिटी उद्योग, या राज्य? और औरत की मर्ज़ी का क्या, जो इस बहस के केंद्र में है? संवाद की शर्तों को कैसे एक पटल पर लाकर और अधिक बराबरी वाला बनाया जा सकता है? एक सरोगेट महिला के श्रम को पूरी तरह से सामाजिक स्वीकृति मिले या न मिले शायद ये ज़रूरी है कि उस पर चर्चा जारी रखी जाए.

रुचिका नेगी द थर्ड आई की एसोसिएट एडिटर हैं.

इस लेख का अनुवाद राजेन्द्र नेगी ने किया है।

पूरी फिल्म देखें : कैन वी सी द बेबी बम्प प्लीज़
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