दुनिया रोज़ बनती है

पिछले दो साल में दुनिया पूरी उलट-पुलट सी गई है. हमने बहुत कुछ खोया, लेकिन वहीं बहुत कुछ नया सीखा, नया जाना. फलौदी राजस्थान की ये कहानियां जानने और सीखने की इंसानी इबारत हैं.

लोकगीत और लोकपरंपराओं वाले राज्य राजस्थान की रहने वाली मनीषा द थर्ड आई के साथ डिजिटल एजुकेटर के रूप में जुड़ी हैं. कोविड की दूसरी लहर के दौरान लोग न केवल बीमारी से परेशान थे बल्कि भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी से बेहाल वे अनाज के एक-एक दाने के लिए तड़प रहे थे. हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए यह दोहरी मार है. मनीषा ने बाकि साथियों के साथ मिलकर द थर्ड आई रिलीफ़ वर्क के ज़रिए फलौदी गांव के कई इलाकों में घूम-घूम कर अनाज बांटने का काम किया ताकि लोगों को थोड़ी राहत मिल सके. ये कहानियां उसी समय की हक़ीकत हैं.

ये कहानियां रूई के फाहे की तरह उम्मीद बनकर उड़ते हुए एकदम हल्के से हमारे कंधे पर आकर बैठ जाती हैं, फ़िर हल्की सी हवा में ये वापस उड़ जाती हैं किसी और ज़मीं को उम्मीद बांटने.

80 किलोमीटर दूर ऑक्सीजन

राजस्थान के जोधपुर ज़िले में घंटियाली पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाला 2000 आबादी का एक गांव है – खाजूसर. इस गांव में एक घर से खड़े होकर देखने पर दूर-दूर तक कोई दूसरा घर या इंसान नज़र नहीं आता. आमतौर पर हमारे घरों के आस-पास पड़ेसी होते हैं पर यहां मीलों तक कोई दूसरा घर नहीं दिखता. अगर घर में कोई अकेला व्यक्ति हो तो उसे देखने वाला भी कोई नहीं.

यहां रहने वाले मांगीलाल जी हमें एक घर में ले गए. जहां एक आदमी फटे कपड़ो में खाट पर लेटा हुआ था. वह मुंह पर कपड़ा बांधे, कमरे के दरवाज़े से बाहर देख रहा था. कमरा बहुत छोटा था. इतनी भरी गर्मी में वहां पंखा तक नहीं था जिससे उसकी हालत दयनीय हो रही थी. उसके पास एक तरफ़ दवाइयों का फैलाव पड़ा था और दूसरी तरफ़ बड़ा सा लम्बा लोहे का ऑक्सीजन सिलेण्डर रखा था जिससे ज़रूरत पड़ने पर समय-समय पर वह ऑक्सीजन लेता और अपनी सांसो को चलाता. उसकी सांसो की क़ीमत 48 घंटों के लिए 5000 रुपए की थी. इस सिलेंडर को वह संभाल-संभाल कर महिने भर तक चलाता था. ये सिलेंडर भी 80 किलोमीटर दूर फलोदी से आता है.

मांगीलाल जी ने हमें बताया कि उसका नाम शाईने खां (41 वर्ष) है जो सिलिकोसिस नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित है. सिलिकोसिस, धूल से होने वाली एक ऐसी बीमारी है जो सिलिका के कणों और टूटे पत्थरों की धूल की वजह से होती है. ईंट-भट्टों में, पत्थर तोड़ने-घिसने के दौरान धूल के ये कण फेफड़ों में जमा हो जाते हैं. फेंफड़ों में चिपक कर ये वहां घाव कर देते हैं जिससे फेंफड़ों का सिकुड़ना-फैलना कम हो जाता और सांस लेने में परेशानी होती है.

इस बीमारी से गांव में अब तक कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है. लगभग 17-18 साल की उम्र में लोग इस काम में लग जाते हैं और 25 से 30 साल की उम्र तक आते-आते मौत के कुएं में जाने लगते हैं. इस कार्य क्षेत्र में अधिक मज़दूरी होने के कारण यहां लोग ज़्यादा जाते थे. प्रतिदिन इस काम में उन्हें 1000-1500 रुपए मिलते व कभी-कभी 2000-2500 रुपए भी मिलते थे.

परन्तु गांव में कई लोगों की मृत्यु हो जाने से अब लोगों के मन में डर बैठ गया और पिछले 5-7 साल से उन्होंने ये काम करना बन्द कर दिया. सबसे ज़्यादा दुख की बात यह थी कि इन पत्थर की खदानों के मालिकों ने इनकी ज़िंदगी की कीमत सिर्फ़ 1 लाख रुपए ही समझी. इस बीमारी से ग्रसित होकर इस काम को छोड़ने वालों के परिवारों को 1-1 लाख रुपए दिए. जबकी इसके इलाज में ही इतना ख़र्चा है कि लोगों के घर तक बिक गए. पिछले 2-3 साल में लगभग 10 लोग इस बीमारी से मर चुके हैं और लगभग 25-30 लोग अभी भी इस बीमारी से ग्रसित हैं जो कभी भी मर सकते हैं. शाईने खां की भी हालत इतनी ही गंभीर है कि आने वाले समय में उसके परिवार के लिए भी बहुत कठिन होगा.

शाईने खां की बीवी और 6 बच्चे हैं. बच्चों को पालने व घर ख़र्च चलाने के लिए वो मनरेगा पर मज़दूरी करती थी लेकिन अभी कोरोना की वजह से वो काम भी बंद है. शाईने खां के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था गांव वाले आपसी सहयोग से करते हैं. ऐसी कठिन परिस्थिति में बच्चों के खाने के लाले पड़ गए है. हम जब खाने का सामान लेकर उनके घर गए तो उनकी स्थिति ने हमें अन्दर तक झकझोर दिया. हमारे पास बोलने के लिए शब्द ही नहीं थे. हम ज़्यादा देर तक वहां ख़ुद को रोक नहीं पाए और किट देकर वहां से चल दिए.

शहर के पास पर सुविधाओं से दूर

फलोदी से करीब 10 किलोमीटर दूर सुविधाओं से घिरा एक ऐसा क्षेत्र, जहां भील समाज के लगभग 10-12 परिवार रहते हैं जिन्हें पूछने वाला कोई नहीं. ये कहानी सिर्फ़ एक परिवार की नहीं बल्की इन सभी भील परिवारों की है जो नज़र में तो रहते हैं लेकिन उन्हें नज़रअंदाज किया जाता है. यह ऐसी जगह है जो शहर के पास ही है पर फिर भी इसपर किसी की नज़र नहीं जाती कि कोई इन ज़रूरतमंदो की मदद कर दे. दूसरा दशक के कार्यकर्ता पुखराज माली ने इनके दुख-दर्द को देखा व समझा और हमारे साथ साझा किया. उन्होंने इस क्षेत्र से अति ज़रूरतमंद परिवारों की सूची बनाकर उन्हें खाद्य सामग्री किट देने का आग्रह किया.

ज़रूरतमंद सूची के अनुसार हम खाद्य सामग्री किट लेकर तय ढाणियों की तरफ निकल पड़े. रास्ते में सहयोगी पुखराज जी मोटर साईकिल से आगे-आगे हमें उन ढाणियों का रास्ता बताते चले. वे आगे-आगे और हम उनके पीछे गाड़ी लेकर चल रहे थे. शुरूआत में पक्की सड़क थी, थोड़ा आगे चले तो पक्के मकान नज़र आ रहे थे. रास्ते में साथियों के बीच हलचल हुई और चर्चा करने लगे कि हम सामान किसको देंगे यहां तो कोई ज़रूरत मंद परिवार नज़र नहीं आ रहा है. फ़िर भी हम हम पुखराज जी की मोटर साईकिल के पीछे चलते रहे. मुख्य सड़क को पार करके कच्चे रास्ते से होते हुए 1 किलोमीटर दूर उन ढाणियों में पहुंचे जहां भील जाति के लोग रहते थे. हमारी गाड़ी को देखकर अलग-अलग झोपड़ी व घरों से महिलाएं एवं बच्चे गाड़ी की तरफ आने लगे. कुछ बच्चे उत्सुकता से दौड़कर आए व कुछ सहमे-सहमे से आने लगे, ये सोचते हुए कि कौन हैं ये लोग और कहां से आए हैं? ऐसी गाड़ी वाले लोगों का हमारे यहां क्या काम? उनका ऐसा सोचना भी लाज़मी था.

पुखराज जी द्वारा सुझाए गए ज़रूरतमंद परिवारों को राहत सामग्री का वितरण किया गया. इसमें पहली जमू नाम की एकल महिला थी. 10 साल पहले उसके पति की मृत्यु हो गई थी जो एक रूई के कारखाना में काम करते थे. धीरे-धीरे रूई फेफड़ो में जाने से सांस की तकलीफ होती गई. उसके 4 बच्चे हैं, 2 लड़के व 2 लड़कियां. उसकी आय का कोई लगा बंधा साधन नहीं हैं. मज़दूरी करती है उसी से उसका घर चलता है. मजदूरी भी रोज़ नहीं मिलती है. दूसरी महिला राधा नाम की थी जिसके पति की मृत्यु 6-7 साल पहले हो गई. वह भी वहीं काम करता था रूई के कारखाने में. उसके 5 बच्चे हैं, 3 लड़कियां व 2 लड़के हैं. राधा भी काम की तलाश में यहां-वहां भटकती रहती है. काम मिल जाए तो दो पैसों की मज़दूरी कर घर का चूल्हा जलाती है. उसकी भी आय का कोई अन्य साधन नहीं है.

परन्तु हमें हैरानी तब हुई जब राधा ने किट लेने से मना कर दिया. उसका से त्याग हम समझ नहीं पाए. फिर हमने उससे पूछा, “मना क्यों कर रही हो तुम्हारे लिए ही लाए हैं.” तब राधा ने कहा, “मेरा तो 2 दिन और गुज़ारा हो जाएगा पर 15 दिन पहले ही मेरे पड़ोस में एक बूड़े आदमी की मृत्यु हो जाने से उसकी बूड़ी पत्नी अकेली है और उसके कोई संतान भी नहीं है और ना उसके घर कुछ खाने को है.”

उसकी बात सुनकर हम स्तब्ध थे. हम सोचने पर मजबूर हो गए कि इनके ख़ुद के खाने के लिए मात्र दो दिन का खाना है. फिर भी इन्होने अपना ना सोचकर अपनी पड़ोसी का सोचा. यह सब देख कर और सुनकर हमारे टीम के साथियों ने आपस में चर्चा कर तुरन्त निर्णय लिया कि उस औरत को भी किट देनी चाहिए फिर चाहे उसका नाम सूची हो या न हो. वह ज़रूरतमंद है यही काफ़ी है. उसके साथ राधा को भी एक किट दी. वहां पर गजरी नाम की बूड़ी महिला मौजूद थी. जिसे हमने कुछ दिया तो नहीं बल्कि उससे हम कुछ लेकर आए और वे थीं बेशकीमती दुआएं.

जब हम वहां से गाड़ी में रवाना होने लगे तब भी गजरी ने निःस्वार्थ भाव से दुआओं का सिलसिला जारी रखा. जब तक हम उसे दिखाई देते रहे तब तक वह हमारी गाड़ी के पीछे-पीछे आती रही और लगातार बोलती रही. हमारे साथियों ने वहां से निकल कर इस बात की चर्चा की, कि भविष्य में भी इन ज़रूरतमंद परिवारों के लिए हमारे पास कोई सुविधा हुई तो इन्हें ज़रूर उपलब्ध करवाने की कोशिश करेंगे.

मनीषा चांडा फलोदी में निरन्तर संस्था के माध्यम से द थर्ड आई के साथ बतौर डिजिटल एजुकेटर कार्यरत हैं. वे जेंडर, स्वास्थ्य, यौनिकता तथा शिक्षा आदि मुद्दों पर हाशिए पर धकेल दिए गए तबकों के साथ डिजिटल तकनीकी के माध्यम से काम करती हैं.
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