दिल्लीः लटकनवाली हिंदी यानी हिंग्लिश का शहर

भाषा एवं उसकी राजनीति के बीच स्थानीय और शहर के मिज़ाज से अपना संस्करण गढ़ती हिंग्लिश

चित्रांकन: शिराज़ हुसैन
अपने भाषाई प्रयोग और कहने के अंदाज़ से दिल्ली एक दिलचस्प शहर है. सत्ता के इस शहर में लाखों कामगार – छोटे दुकानदार दिहाड़ी जिस पंजाबी-हरियाणवी, बिहारी-भोजपुरी के प्रभाव के साथ हिंदी का प्रयोग करते हैं, उस हिंदी में अंग्रेज़ी और उसके शब्द एक खास किस्म की लटकन है. यह लटकन एक तरफ जहां हिंदी को पूरी तरह हिंदी नहीं रहने देती तो दूसरी तरफ अंग्रेज़ी की जो अपनी ठसक है, उससे इन्हें आक्रांत होने से बचा लेती है.
व्याकरण और भाषाई शुद्धता के आग्रह से यदि इस लटकनवाली हिंदी को देखा जाए तो ‘हाय हमारी हिंदी’ के स्यापा का एक नया बहाना हमारे सामने होगा लेकिन अंग्रेज़ी शब्दों के अंधाधुन इस्तेमाल के बीच भी इन कामगारों ने अंग्रेज़ी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है, अपने जीवन और मिज़ाज को बरकरार रखा है, इस लिहाज़ से यह शहर देश के किसी भी दूसरे शहर से बिल्कुल अलग जान पड़ता है. दूसरा कि देश के अलग-अलग अहिंदी प्रदेश से आए लोग जब इस लटकनवाली हिंदी को बोलने का अभ्यास करते हैं तो उसका एक और संस्करण हमारे सामने होता है. मसलन उच्चारण किए जाने के अंदाज़ से वे बांग्ला, तमिल, गुजराती, मराठी जैसे ही सुनाई देते हैं मगर वह बीच-बीच में अंग्रेज़ी के कोड में घुली हिंदी ही होती है.

जिस लटकनवाली हिंदी को लेकर आगे हम बात करने जा रहे हैं, दरअसल ये वही लटकन है जिसे कि अब हिंग्लिश कहा जाने लगा है और इसके प्रयोग किए जाने के पीछे की सामाजिकी और तर्क को अकादमिक स्तर पर देखने-समझने की पिछले कुछ सालों से कोशिशें तेज़ हुई हैं.

क्या अंग्रेज़ी और हिंदी की ही तरह हिंग्लिश भी एक भाषा या तीसरी भाषा है जिसे कि हिंदी-अंग्रेज़ी बरतने वाले लोग स्वाभाविक ढंग से व्यवहार में लाते हैं? ऐसा करते हुए वे अलग से कोई दावा पेश नहीं कर रहे होते जबकि प्रयोग किए जाने के पीछे पर्याप्त तर्क हुआ करते हैं. हिंग्लिश को लेकर हो रहे अध्ययन और विमर्श की दुनिया में यह सवाल कुछ मूल प्रस्तावनाओं के साथ अभी भी मौजूद है जबकि एप्पल जैसे ब्रांड ने सालों पहले अपने आईओएस में भाषा-चयन के विकल्प में हिंग्लिश को अलग से शामिल कर लिया. यहां दिल्ली शहर के भाषाई व्यवहार के संदर्भ में हिंग्लिश को अलग से भाषा मानने या न मानने के पीछे के क्या तर्क हो सकते हैं, उसकी बारीक़ियों में गए बग़ैर इतना तो स्पष्ट रूप से हम समझ पा रहे हैं कि जिस तरह हिंदी या अंग्रेज़ी अपने मूल व्याकरण, वर्तनी और शर्तों के निर्धारण के बावजूद एक ढंग से व्यवहार में नहीं लाई जाती और ये दोनों भाषाएं व्यक्तिवाचक (प्रॉपर नाउन) होते हुए भी तेज़ी से समूहवाचक में बदली हैं, वे अनेक हिंदी और अंग्रेज़ी हो चली हैं, हिंग्लिश का मामला भी उसी रूप में बनता दिखलाई पड़ रहा है.

यानी इस शहर के अलग-अलग हिस्से में रहनेवाले और दूसरे अलग-अलग प्रदेश से आए लोग हिंदी में लटकन यानी हिंग्लिश का प्रयोग अलग ढंग से कर रहे हैं और तब यह एकवचन में नहीं रह जाती. दिल्ली के मामले में “हिंग्लिश” क्या अलग से कोई भाषा है, का सवाल जितना ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा इस बात की पहचान कर पाना कि यह अपने एकवचन रूप में मौज़ूद नहीं है और इसलिए हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के कोड मिलाने या पूरे-पूरे कोड को बदल देने (कोड मिक्सिंग – कोड स्विचिंग) को हिंग्लिश क़रार देने की जो सुविधा रही, अब यहां वो सुविधा तेज़ी से ख़त्म होती नज़र आती है.

हिंग्लिश अब एकवचन में इस्तेमाल नहीं की जाती, इस बात को समझने के लिए दो किताबें सीधे-सीधे हमारे मतलब की हैं – एक तो ‘चटनीफाइंग इंग्लिशः दि फेनोमेनन ऑफ हिंग्लिश‘ जिसे कि रीता कोठारी और रूपर्ट स्नेल ने संपादित किया है और दूसरी इसी साल शिक्षाविद फ्रैंचेस्का ओरसिनी और इतिहासकार रविकांत द्वारा संपादित किताब ‘हिंग्लिश लाइवः लैंग्वेज मिक्सिंग एक्रॉस मीडिया‘. अलग-अलग प्रदेश और माध्यमों की ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल की जानेवाली हिंग्लिश और उसके तर्कों को इन दोनों किताबों के सहयोगी लेखक सामने रखते हैं, वे यह स्वाभाविक ढंग से स्थापित करते हैं कि हिंग्लिश एकवचन में, एक तरह से इस्तेमाल नहीं होती. मसलन हिंदी के टीवी चैनलों और समाचारपत्रों की हिंग्लिश एक-दूसरे से अलग होती है क्योंकि दोनों के पीछे मौजूद माध्यम के अपने तर्क व लक्ष्य और उपभोक्ता की शर्तें काम कर रही होती हैं.

चटनीफाइंग हिंग्लिश में इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि दक्षिण मुंबई या दिल्ली की हिंग्लिश, पूरे शहर की हिंग्लिश से अलग होती है जिसे कि प्रसून जोशी एफएम रेडियो के मामले में “अपमार्केट बनाने की कोशिश में इस्तेमाल की गई हिंग्लिश” कहते हैं. यहां महज़ दक्षिणी दिल्ली की बात न करके पूरे शहर में इस्तेमाल की जानेवाली हिंग्लिश पर गौर करें तो इसके कई आधार हमारे सामने होते हैं और मेहनत की जाए तो हिंग्लिश के इस रूप से एक इलाके को दूसरे से सहजता से अलगाया जा सकता है. मसलन, पूर्वी दिल्ली –

यमुना पार इलाके की हिंदी पूरे शहर की हिंदी से अलग है. यह फर्क तब और आसानी से दिखलाई पड़ता है जब लोग ‘लड़की’ को ‘लेड़की’ बोलते हैं. यह प्रयोग इतना सहज और साथ ही आदतन इतना गहरा है कि जब उन्हें अंग्रेज़ी के शब्दों का मसलन ‘लंच’ प्रयोग करना होता है तो ‘लेंच’ बोलते हैं.

हिंदी और अंग्रेज़ी के पहरुए बड़ी आसानी से इस प्रयोग को गलत करार दे सकते हैं या स्थानीय प्रभाव बतलाकर मूलतः हिंदी-अंग्रेज़ी का बिगड़ा रूप बता सकते हैं लेकिन हिंग्लिश के सिरे से देखा जाए तो दोनों में एकरूपता स्पष्ट है. इसी तरह पूरी दिल्ली में और ख़ासतौर पर उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली में पंजाबी प्रभाव के कारण ‘खींचना’ को ‘खैंचना’ बोलना आम चलन का हिस्सा है. अब इसके प्रभाव से ‘लेटर’, ‘डेस्क’, ‘नेवी’ जैसे अंग्रेज़ी के शब्द क्रमशः ‘लैटर’, ‘डैस्क’, ‘नैवी’ हो जाते हैं. अंग्रेज़ी में जहां-जहां ‘ए’ उच्चारण के साथ शुरु होनेवाले शब्द हैं वे इस प्रभाव के कारण ‘ऐ’ हो जाते हैं और जिसका असर यह होता है कि वे अंग्रेज़ी के कोड या शब्द होते हुए भी स्थानीय शब्दावली का स्वाभाविक हिस्सा जान पड़ते हैं.

हरियाणवी या हरियाणवी-पंजाबी प्रभावित हिंदी भाषी, हिंदी के कई वर्णों के आधा लिखे जाने के बावजूद उसे पूरा और बल्कि ज़ोर लगाकर बोलते हैं जिसे कि हिंदी में बलाघात-स्वराघात के अंतर्गत पढ़ा समझा जाता है. हिंदी में ‘क्लेश’ शब्द इसी प्रभाव से ‘कलेश’ और ‘गृह’ शब्द ‘ग्रह’ हो जाता है. ऐसे में वे जब लटकनवाली हिंदी यानी हिंग्लिश बोलते हैं तो अंग्रेज़ी का ‘स्क्रीन’, ‘स्पेस’, ‘बल्ब’ क्रमशः ‘सकरीन’, ‘सपेस’ और ‘बलब’ हो जाता है. इसका मतलब है कि अंग्रेज़ी के इन शब्दों को उच्चारण के लिहाज़ से अपनी मूल पहचान छोड़नी होगी और उसी रूप में आना होगा जैसे हिंदी का क्लेश आता है.

पूर्वी भारत से आकर दिल्ली में बसे या रह रहे हिंदी भाषी की लटकनवाली हिंदी न केवल उच्चारण की दृष्टि से अपने स्थानीय प्रभाव के साथ इस्तेमाल होती है बल्कि इस क्रम में एकदम अलग और नए कोड को भी गढ़ना होता है. मसलन दिल्ली में जिस तरह से मोमोज़ पिछले दस-पंद्रह सालों में लोकप्रिय हुए हैं जिनपर द थर्ड आई ने अलग से स्टोरी भी की है, उनसे मुकाबला करते हुए लिट्टी का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है. दिलचस्प है कि एक तरफ पूरा ज़ोर-शोर इस शब्द और व्यंजन को लोकप्रिय बनाने में लगाया जा रहा है तो दूसरी तरफ सीधे-सीधे इसे ‘बिहारी मोमोज़’ बताकर मोमोज़ की लोकप्रियता को लिट्टी की तरफ शिफ्ट करने की कोशिशें भी चल रही हैं. दिल्ली के मुनिरका, कटवारिया सराय, नेहरू विहार जैसे छात्र बहुल इलाकों में इस नाम के साथ आसानी से बोर्ड देखे जा सकते हैं. ऐसा ही एक प्रयोग दिल्ली के अलग-अलग हॉस्टलों में रह रहे छात्रों के बीच चलन में है.

बिहार-पूर्वी उत्तरप्रदेश के इलाके से आए छात्रों के बीच सत्तू जो कि चने को अच्छी तरह भूनने के बाद छिलके उतारकर पीसकर तैयार किया जाता है, बेहद लोकप्रिय है. इसे बिना बहुत ज़्यादा समय और मेहनत लगाए पानी के साथ नमक-नींबू मिलाकर सुबह-सुबह पीने का प्रचलन है. इस इलाके से आए छात्र बड़ी शान से इसे सत्तू बोलने के बजाए ‘बिहारी हॉर्लिक्स’ बोलते हैं.

चांदनी-चौक, पुरानी दिल्ली की हिंदी, शहर के बाक़ी इलाके की हिंदी से अलग है. यह फर्क महज़ उर्दू-अरबी-फारसी शब्दों के बहुतायत प्रयोग भर के कारण नहीं है बल्कि साहित्यिक शब्दों और अभिव्यक्ति के प्रयोग का चलन अभी भी यहां मौजूद है, दुर्भाग्य से वो साहित्यिक दुनिया में भी तेज़ी से ख़त्म होते जा रहे हैं. ऐसे में इस इलाके के लोग जब हिंग्लिश का प्रयोग करते हैं तो ये हरियाणवी-पंजाबी या फिर पूर्वी हिंदी के प्रभाव में ढलकर बिल्कुल उसी के अनुरूप न होकर अलग से पहचानी और खड़ी नज़र आती है. मसलन तसल्ली बख्श के साथ जब ‘रिपेयरिंग’ शब्द आता है तो उसका प्रभाव उसी तरह का होता है जैसे भौतिकी की कक्षा में कुचालक-सुचालक समझाने के लिए लोहे की तार और लकड़ी का प्रयोग किया जाए. इस इलाके की हिंदी को लोगों के ध्यान में लाने के लिए रेडियो चैनल रेड एफएम 93.5 ने ‘चचा बतोले‘ नाम से अलग से एक फिलर का प्रसारण शुरु किया. हालांकि इस फिलर में पुरानी दिल्ली की हिंदी को स्टीरियोटाइप में बदलने की कोशिश ज़्यादा नज़र आती है लेकिन इस हिंदी के साथ जब हिंग्लिश का प्रयोग होता है तो वो ठीक उसी तरह नहीं घुलती जैसे बाकी के प्रदेशों और इलाकों के लोग उच्चारण और वर्णों के हेर-फेर के साथ इस अंदाज़ में इस्तेमाल करते हैं कि ऐसे शब्दों के अंग्रेज़ी होने के दावे कमज़ोर पड़ जाएं.

पूरी दिल्ली में अंग्रेज़ी का ‘बन-बटर’ बंद-बटर हो चला है. यह प्रयोग इतना लोकप्रिय और सामान्य है कि रेडी-पटरी से लेकर मंहगे कैफे की मेन्यू तक में बंद ही लिखा होता है.

यहां यह बात जोड़ देना ज़रूरी है कि कई बार ऐसे प्रयोग स्थानीय और असली-बेहतर होने का प्रभाव पैदा करने के लिए भी किए जाते हैं. इसी तरह ‘पैटी’ या ‘पैटीज़’ बड़ी ही सहजता से ‘पेटिस’ लिखा या बोला जाता है. मैंने शुरु-शुरु में जब सुना तो मुंबई की रगड़ा-पेटिस का ध्यान हो आया जो कि सफ़ेद मटर के छोले और आलूचॉप को कहा जाता है. “परली साइड बराबर में” प्रयोग इतना स्वाभाविक है कि कभी ध्यान ही नहीं आता कि परली के साथ अंग्रेज़ी का साइड कैसे जुड़ गया और लोग इस शब्द का अर्थ आसानी से समझते हैं बल्कि बतानेवाले को आशंका होती है तो अलग से उल्टे हाथ, बराबर में जोड़ देते हैं. किसी चीज़ की गुणवत्ता गड़बड़ हो या फिर वैसी नहीं हो जैसी होनी चाहिए तो दुकानदारों के पास पहले से जवाब तैयार होता है – पीछे से सप्लाय ऐसा ही है. पीछे से का मतलब फैक्ट्री या खेत जहां से उस वस्तु का उत्पादन हुआ है.

हिंदी या दूसरी भाषाओं के साथ अंग्रेज़ी के शब्दों के प्रयोग, उसके कोड को मिलाना या फिर एकदम बदलकर प्रयोग किए जाने को लेकर कई तरह के तर्क प्रस्तावित किए जाते रहे हैं. एफएम रेडियो के संदर्भ में मैंने अपने एक लेख ‘एफएम हिंग्लिशः आदत और सहजता के तर्कों के बीच’ में इसपर विस्तार से चर्चा की है. लेकिन दिल्ली के मामले में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि यहां हिंदी को लेकर खास स्थानीय बोध है और जो कि अपमार्केट-लोमार्केट की बहस से अलग है, उसके कारण ऐसे कई अंग्रेज़ी के शब्द और हिंग्लिश प्रयोग थोड़े समय के बाद बंद हो जाते हैं. मसलन, एफएम रेडियो चैनलों ने जब दिल्ली की सड़कों पर यातायात-वाहन को लेकर अपने श्रोताओं को ट्रैफिक अपडेट देना शुरु किया तो उनके वाक्य इस तरह से होते – “यदि आप महारानी बाग से सराय काले खां की तरफ जा रहे हैं तो आपको हेवी ट्रैफिक का सामना करना पड़ सकता है.” ये प्रयोग तीन-चार साल चला क्योंकि तब एमटीवी की तर्ज़ पर एफएम रेडियो की समझ ऐसी रही कि शहरी परिवेश निर्मिति के लिए ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेज़ी शब्दों और हिंग्लिश का प्रयोग ज़रूरी है. लेकिन

‘हेवी ट्रैफिक’ और जाम के बीच झल्लाकर फोन पर या आपसी बातचीत में ठीक यही शब्द इस्तेमाल नहीं करते. वे सीधे-सीधे कहते हैं - यार, महारानी बाग की तरफ से आ रहा हूं, भारी भसड़ मची है यहां तो. ‘भसड़’ दिल्ली में प्रयोग किए जानेवाला वो शब्द है जिसने देखते-देखते अंग्रेज़ी के आधे दर्जन से भी ज़्यादा शब्दों के प्रयोग को कम कर दिया.

यह हमें भले ही दिखाई देता है कि हिंदी में अंग्रेज़ी शब्दों का चलन बेतहाशा बढ़ा है जिसकी एक वजह यह भी है कि जब कारखानों और प्रयोगशालाओं से वस्तुएं बाज़ार में आती हैं तो अपने साथ ही अंग्रेज़ी लेकर आती हैं तो उसे ‘हिंदी में संस्कारित’ करने की ज़हमत कौन उठाए और उठाई भी जाए तो यह कितना सतही स्तर का काम होगा. लेकिन दिल्ली की हिंदी और हिंग्लिश के मामले में कई बार सुई उल्टी भी घूमती है और तब बहुवचन हिंग्लिश के बीच उसका एक संस्करण लोकल-हिंग्लिश का भी होता है. यह भी अलग-अलग इलाके में अलग ढंग से, स्थानीय ढंग से प्रयोग किया जाता है. ऐसे में दिल्ली की हिंग्लिश समझने का एक तरीका तो यह है कि अभिव्यक्ति-संप्रेषण की जितनी भी एजेंसियां हैं, वे किस तरह की हिंग्लिश इस्तेमाल कर रही हैं और शहर उसे कैसे अपना रहा है और दूसरा तरीका यह है कि कैसे शहर अपने स्थानीय प्रभाव (जो कि स्वाभाविक रूप से बहुवचन है) के बीच से हिंग्लिश का इस्तेमाल कर रहा है?

एक पेय पदार्थ के ब्रांड ने स्थापित कर दिया है कि ठंडा मतलब बोलने से आगे क्या होता है, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर अल्यूमिनयम के सैंकड़ों बक्सों के ऊपर लिखा देखते हैं - ‘ठंडा मतलब मशीन का ठंडा पानी’ तो तुकबंदी और विज्ञापन की आक्रमकता के बीच से वह ब्रांड पीछे छूट जाता है.

आप चाहें तो कह सकते हैं कि इस हिसाब से इस शहर की हिंदी दो मोर्चों पर हिंग्लिश का इस्तेमाल करती है – एक तो अंग्रेज़ी के शब्द-कोड इस्तेमाल किए जाने के बावजूद स्वयं अंग्रेज़ी के दावे को कमज़ोर करने के रूप में और दूसरा भारी लागत के बीच हिंग्लिश का प्रयोग किए जाने के बीच उस प्रभाव को निरस्त करके स्थानीय और शहर के मिज़ाज के हिसाब से इसका अपना संस्करण तैयार करने के तौर पर और ये दोनों ही ऐसी स्थितियां हैं जो इसे एक खास तरह का हिंग्लिश का शहर बनाती हैं.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार, दिल्ली विश्वविद्य़ालय के बी. आर. आम्बेडकर कॉलेज में साहित्य और मीडिया विषय पढ़ाते हैं. विनीत ने हिंदी मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम कार्यक्रमों की भाषा एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान पर अपनी पीएचडी की है. ‘मंडी में मीडिया’ किताब ((2012, वाणी प्रकाशन) बाज़ार और मीडिया के नेक्सेस पर प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण किताब है. उन्होंने सराये (सीएसडीएस) के हिंगलिश प्रोजेक्ट में बतौर शोधकर्ता रिसर्च प्रेजेंट किया है. इस शोध पर आधारित किताब ‘हिंगलिश लाइव’ ओरिएंट ब्लैकस्वान द्वारा प्रकाशित की गई है. अल जज़ीरा, एनडीटीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनलों के अलावा कई महत्त्वपूर्ण हिंदी समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में निरंतर लेखन, मीडिया और पॉपुलर कल्चर शोध के साथ-साथ विनीत खाना बनाने और उसके अभ्यास पर टोकियो विश्वविद्यालय के जेएएसएएस फूड प्रोजेक्ट में बतौर फेलो भाग ले चुके हैं. सोशल मीडिया पर ‘बैचलर्स किचन’ प्रचलित हैशटैग के अंतर्गत विनीत अपनी पाक कला के प्रदर्शन के साथ उसकी व्यावहारिकता पर भी विचार व्यक्त करते हैं.
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