किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी, मगर कोई चेहरा भी पढ़ा है?

क्रोध, भय, शिद्दत और खुशी एक शिक्षक की पैडोगॉजी में उसे क्या हासिल करने देते हैं?

ढाए गए फरीदाबाद के खोरी गांव का कल्लोल मुखर्जी द्वारा लिया गया चित्र.

पिछले ‘शहर’ अंक में हमने गौतम भान से सरकारी नीतियों के बीच शहरों के बनने की प्रक्रिया, शहरी गरीबों की पहचान के सवाल और शहरी अध्ययन के तरीकों पर बातचीत की थी. इस अंक में गौतम, हमसे अध्यापन कार्य की प्रक्रिया में क्रोध और उसकी बंदिशों पर चर्चा कर रहे हैं. गौतम का मानना है कि आनंद और उल्लास सीखने की प्रक्रिया में गहराई लाते हैं.

गौतम भान, इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट (IIHS) में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं. वर्तमान में वे एसोसिएट डीन एवं एकेडमिक्स एंड रिसर्च सीनियर लीड के बतौर कार्यरत हैं. पढ़िए शिक्षा अंक में गौतम भान से बातचीत.

टीटीई: मैं उत्सुक हूं यह जानने के लिए कि सामाजिक न्याय के मुद्दों के साथ संलग्न होने पर छात्रों के भीतर उमड़ने वाली भावनाओं को बतौर शिक्षक आप कैसे देखते हैं? क्या कोई ऐसे भाव भी हैं जो शिक्षण कार्य की प्रक्रिया या पेडागॉजी को चुनौती देते हैं?

गौतम: मेरे ख्याल से क्रोध या गुस्से को आप पेडागॉजी के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते. लोगों के भीतर बहुत गुस्सा है लेकिन गुस्से से आप सीख नहीं सकते ना ही कुछ सिखा सकते हैं. ये सिर्फ हिंसा या लड़ाई झगड़े को जन्म देता है. कुछ लोगों का मानना है कि गुस्से से बदलाव लाया जा सकता है. असल में गुस्से का उपयोग किसी काम के लिए नहीं किया जा सकता. गुस्सा आपके हाथ में नहीं आएगा. तो, तरकीब यही है कि उन कारकों पर बैठकर बात की जाए जिसकी वजह से गुस्सा है. क्योंकि गुस्से की जड़ में करुणा या सहानुभूति का होना ज़रूरी है.

आप गुस्सा हैं क्योंकि आप करुणा महसूस कर रहे हैं. मैं गुस्से के भीतर कहीं दबे करुणा के इस भाव को ही पैडोगॉजी में इस्तेमाल कर पूछना चाहता हूं कि अब बताओ तुम्हारे भीतर कितनी शिद्दत है?

यहीं से शिक्षण की प्रक्रिया शुरू होती है.

मेरे एक दोस्त मारियो डी पेन्हा ने कभी मुझसे कुछ कहा था जिसे मैं पिछले दस साल से अपनी कक्षाओं में क्लास दर क्लास, स्टुडेंट दर स्टुडेंट दोहराते आ रहा हूं. उसने कहा था कि ज़िंदगी का असल सच करुणा और गुस्से के बीच संतुलन बनाए रखना है. वह ऐसे बहुत सारे लोगों को जानता था जिनके भीतर गुस्सा है लेकिन करुणा नहीं, या करुणा है पर गुस्सा नहीं. इन दोनों ही स्थितियों के परिणाम बहुत अलग हो सकते हैं.

मुझे लगता है कि हमें जो काम करना है, वह यह कि हम बोलें, अगर ये आपका क्रोध है, तो अपने क्रोध को करुणा की भाषा दें. ताकि उसका एक नैतिक आधार हो. साथ ही अपने क्रोध को इतनी शिद्दत से समझें कि सवाल कर सकें कि आखिर नाराज़गी किस बात की है? नाराज़गी स्पष्ट होनी चाहिए. अगर, व्यवस्था से नाराज़गी है तो, उसे समझने का प्रयास करें. सवाल पूछना शुरू करें, पता करें कि स्वास्थ्य पर हमारा जीडीपी खर्च पिछले 25 सालों से 1% क्यों रहा है? सही सवाल पूछें!

यहां पेडोगॉजी की भूमिका, विशेष रूप से, क्रोध जैसी भावना को शिद्दत और सहानुभूति देने की है, उसे एक भाषा देने की है.

उसे एक रास्ता देने की है ताकि कहीं पहुंचा जा सके. क्रोध, दो-धारी तलवार की तरह है. जहां एक ओर इसकी ज़रूरत परिवर्तन के लिए एकजुटता लाने में है वहीं ये किसी के वश में नहीं होता. पेडोगॉजी के रूप से, मैं हमेशा यही कहता हूं कि इस क्रोध के नीचे भय है, इसके नीचे करुणा भी है, और भय और करुणा अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं.

कॉलेज के समय हमने बहुत सारे सिग्नेचर कैंपेन चलाए हैं. उस वक्त लोग कहते, ‘अगर आपको गुस्सा नहीं आ रहा मतलब आपको फर्क नहीं पड़ रहा.’ लेकिन, सच्चाई ये है कि अगर आप लगातार नाराज़ हैं तो आप काम नहीं कर रहे हैं. क्रोध या गुस्से को समझना ठीक है लेकिन उसके आगे इससे कुछ ठोस गढ़ पाना ये भी उतना ही ज़रूरी काम है.

चित्र साभार: यशस चंद्रा

हर साल मैं अपने स्टुडेंट्स को यही कहता हूं कि मुझे भी पता है कि दुनिया में सब कुछ ठीक नहीं है. लेकिन, मुझे आपसे कम से कम दो ऐसे आइडिया चाहिए जो इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हों. बस, खड़े होकर कोसने से कुछ नहीं होगा.

यदि आप वास्तव में सड़क पर चलने वाले प्रवासी मज़दूरों को लेकर परेशान हैं तो पता लगाइए कि उन्हें ऐसा क्यों लगा कि शहर की तुलना में उनका गांव उनके लिए बेहतर है? क्यों किराया न बढ़ाने या उसे कम करने से जुड़े कानून काम नहीं करते? यही पेडोगॉजी है. यहां हम सड़कों पर पैदल घर लौट रहे प्रवासियों की स्थिति का उपयोग उन्हें सुरक्षित महसूस कराने और शहरी सामाजिकता को और मानवीय बनाने में कर सकते हैं, जहां सिद्धांत, व्यवहार और राजनीति एक साथ आते हैं.

महामारी के बाद की परिस्थितियों में हमें यही सवाल पूछना चाहिए कि कौन हमारे साथ खड़ा है – परिवार? या वो गली जिसकी बात हमने पिछले अंक में की थी. दोस्त? वे कौन से ढांचे हैं जो साथ खड़े रहे? आप किन रिश्तों पर भरोसा कर सकते हैं? क्या हमारा समुदाय साथ खड़ा है? साथ काम करने वाले लोग? यूनियन? क्या हुआ उन सोसाइटी का जो हमने मिलकर खड़ी की थीं? आप चाहें तो इन सारे सवालों को परे हटाकर कह दें कि भाड़ में जाए दुनिया.

सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम क्या बना रहे हैं और इसे किस तरह बना रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि संस्थाएं कोई बहुत शक्तिशाली चीज़ हैं. मेरे लिए एक छोटा सा इंस्टीट्यूट एक संस्था है. गली में सामूहिक रूप से एक-दूसरे के बच्चों की देखभाल करने वाले पड़ोसियों का समूह संस्था है. आप इन्हें सामाजिक संरचना कह सकते हैं, आप इन्हें सामूहिकता कह सकते हैं. लेकिन सवाल है कि हम उन नेटवर्क का निर्माण कैसे करते हैं?

दरअसल, हमारा अंतहीन संघर्ष भूलने के खिलाफ है.

और लोग अपनी भावनात्मक स्थिरता को बनाए रखने के लिए चीज़ों को भूलना चाहते हैं. मेरे बहुत से स्टुडेंट कोविड के दौरान राहत कार्य में शामिल थे. और अब जब मैं उन्हें कुछ साल बाद क्लास के बाहर काम करते देखता हूं, और वो भी विषम परिस्थितियों में काम करते देखता हूं तो बहुत सुखद आश्चर्य होता है. वे लगातार कठोर सवाल पूछ रहे हैं. यदि आप अपनी सहानुभूति के बीच में उस कठोरता को धारण कर सकते हैं तो हमारे पास एक मौका है.

लेकिन आप समानुभूति कैसे सिखाते हैं?

हमारे बीच यह हमेशा से बहस का एक मुद्दा रहा है. मुझे नहीं लगता कि आप किसी को समानुभूति सिखा सकते हैं, लेकिन हां, आप ऐसे अवसर ज़रूर पैदा कर सकते हैं जिसमें कि छात्रों को ऐसे अनुभवों, कहानियों और आख्यानों से गुज़रने का मौका मिले, जिसकी बदौलत कम से कम उनमें यह भावना अंकुरित हो सके. मेरे ऐसा कहने का आशय क्या है? देखिए,

मैं जाति, जेंडर और यौनिकता के बारे में बात कर सकता हूं लेकिन अगर मेरे क्लासरूम, डिपार्टमेंट और छात्रों में विविधता नहीं हैं तो फिर इसके बारे में बात करना ही बेमानी है.

हमारे पाठ्यक्रम में [IIHS में अर्बन फेलो प्रोग्राम/ शहरी अध्येता कार्यक्रम के लिए] जिसे हम कॉमन्स कहते है, ये इंटरडिसिप्लिनरी फाउंडेशन कोर्स है. हम अर्बन स्टडीज़ पढ़ाते हैं. प्रचलित दृष्टिकोण यह है कि शहर की बसावट योजनाओं, वास्तुकला और डिज़ाइन पर टिकी होती है. लेकिन, शहर कोई योजना, वास्तुकला और डिज़ाइन नहीं है, है ना? शहर वास्तव में सामाजिक, स्थानिक और आर्थिक है.

हमारे छात्र ज्ञान के लगभग सभी अनुशासनों – दृश्य कला, औद्योगिक डिज़ाइन, अर्थशास्त्र, भूविज्ञान, भौगोलिक सूचना तंत्र (जीआईएस), लोक राजनीति विज्ञान, मीडिया, दंत चिकित्सा आदि विषय-क्षेत्रों से आते हैं. और हमारा पहला काम अर्थशास्त्र के स्नातक को संस्कृति के बारे में सोचना सिखाना है. आपको एक एनथ्रोपॉलिजी के स्टुडेंट को अर्थशास्त्र का अध्ययन करना सिखाना होगा. आपको एक वित्त विशेषज्ञ को पर्यावरण के बारे में सोचना सिखाना होगा, इत्यादि. और हम ऐसा अपनी उन मूलभूत अनुभूतियों के आधार पर करते हैं जो इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करती हैं और जिससे हमारे अकादमिक दृष्टिकोण का पता चलता है.

लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि

अगर मुझे अर्बन स्टडीज़ पढ़ाना है, तो शहर को मेरी कक्षा में होना चाहिए. अगर यह मेरी कक्षा में नहीं है, तो मैं इसे नहीं पढ़ा सकता. अब, अगर कक्षा में समलैंगिक, दलित नहीं हैं, तो यह कैसे काम करेगा?

मुझे शैक्षणिक उत्कृष्टता की दृष्टि से इसकी ज़रूरत है और मुझे लगता है कि यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. कहने का आशय ये है कि आपके अपने जीवन अनुभवों के बिना हम आपको यह सिखा नहीं सकते क्योंकि ये जीवन के अनुभव ही हैं जो हम सिखा रहे हैं.

संवेदनाओं या अनुभूतियों की तालीम देने के अन्य तरीके भी हैं. उदाहरण के लिए, हमारे पाठ्यक्रम डिज़ाइन में, कुल पाठ्यक्रम अवधि का 40% शहर में, क्षेत्र में, पड़ोस आदि में बिताना होता है. यह वास्तव में परस्पर प्रभाव डालने की प्रक्रिया है. आपको ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए जो आपने नहीं देखी हैं. आपको उन जगहों पर जाना चाहिए जहां आप नहीं गए हैं. आपको उन लोगों से बात करनी चाहिए जिनसे आपने बात नहीं की है.

चित्र साभार: यशस चंद्रा

यह जो अपने विषय से इतर दूसरे विषयों की जानकारी वाला नज़रिया है, ये कैसे काम करता है? कुछ इसके बारे में भी बताएं.

मैं आपको एक प्रोजेक्ट का उदाहरण देता हूं. स्नातक की एक छात्रा है गौरी नागापाल, जिसने एक रेहड़ी या ठेला (स्ट्रीट वेंडिंग कार्ट) डिज़ाइन की है. ये रेहडी, बिक्री से जुड़े नगरपालिका द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप है और इसमें एक इलेक्ट्रिक इंजन भी लगा है. लेकिन सबसे खास बात यह है कि किसी भी स्थानीय मैकेनिक रिपेयर की दुकान में मिलने वाले स्पेयर पार्ट्स की मदद से इस रेहड़ी या ठेले को बनाया जा सकता है. और खराब होने पर इसकी मरम्मत भी की जा सकती है.

वह स्टुडेंट सृष्टि डिज़ाइन स्कूल से पढ़कर आई थी. यहां वह अपने डिज़ाइन की ट्रेनिंग को शहर के वेंडिंग एक्ट (नगर पथ-विक्रय अधिनियम) के ज्ञान के साथ एकीकृत कर सकी. साथ ही चंडीगढ़ नगरपालिका योजना को देखने-समझने में सक्षम हुई. अब वह शहर के वेंडिंग वाले इलाके को अच्छी तरह से समझ सकती है. उसके हिसाब से ये रेहडी न सिर्फ नए उत्पाद का निर्माण कर सकती है. बल्कि मरम्मत व्यवसाय का एक मॉडल भी तैयार कर सकती है. वह मुझसे कहती रहती है कि मुझे ठेला-रेहड़ी में कोई दिलचस्पी नहीं है. मुझे इस तथ्य में दिलचस्पी है कि यह साइकिल की मरम्मत करनेवालों के व्यवसाय में कुछ नया जोड़ रहा है. पहले से ही रेहड़ी है, रेहड़ी को अब अपग्रेड करो!

तो, वह जो बेच रही है वह मरम्मत है... यह मेरे लिए वाकई शानदार है क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसा इस अध्यापन-कला से ही मुमकिन है.

मैं आपको इस तरह की परियोजनाओं के कई और उदाहरण दे सकता हूं. हम घरेलू कामगार संघ के साथ इस अध्ययन पर काम कर रहे थे कि घरेलू कामगार अपने बच्चों को स्तनपान कैसे कराती हैं, क्योंकि सवाल था कि घरेलू कामगार छह महीने तक सारा काम-धाम छोड़कर अपने बच्चे को सिर्फ स्तनपान कैसे करा पाती है? अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में छह महीने का मातृत्व अवकाश किसे मिलता है? और जवाब, निश्चित रूप से नकारात्मक है, वे अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा पाती हैं.

हमने यह शोध शुरू किया और पाया कि दिल्ली में ये महिलाएं डिलीवरी के तीन हफ्ते बाद ही अपने काम पर वापस लौट आती हैं. छह महीने तक बच्चे को सिर्फ स्तनपान कराने की बात तो भूल ही जाइए, अभी तो खुद उनकी सेहत पर भयानक जोखिम मंडरा रहा होता है. तो, फिर हम प्रस्ताव की स्थिति की ओर बढ़ते हैं – घरेलू कामगारों के लिए प्रसव के बाद काम पर लौटने में देरी करने का नतीजा क्या होगा? क्योंकि वह जितना अधिक अपने घर पर रहती हैं, उनके स्वास्थ्य के लिए उतना ही बेहतर होता है.

जब हम इस समस्या पर विचार करते हैं, तो हमें नहीं लगता कि हमारे पास इसका कोई जादुई हल है. हम बस इतना जानते हैं कि ये क्रमिक रूप से थोड़ा बेहतर होगा क्योंकि यही असमानता है. इसके उपचार के लिए कोई जादू की गोली नहीं है. और हम अपने छात्रों को बार-बार यही समझाते हैं कि वे हमसे यह पूछना बंद करें कि सिस्टम को कैसे ठीक किया जाए. कोई भी सिस्टम को ठीक नहीं कर सकता है, यही सिस्टम है.

अब, 24 घंटे घर पर रहने वाले घरेलू कामगार वाला मॉडल समाप्त हो गया है. अब हर कोई डेढ़-डेढ़ घंटे के हिसाब से पांच-पांच घरों में काम करता है, जिसका मतलब है कि आप जगह-जगह घूम रहे हैं, घूम-घूम कर काम कर रहे हैं. आपके लिए यातायात तंत्र महत्त्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन, यह सुरक्षा-सम्मान की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल तो कामकाजी महिलाओं की गतिशीलता और यह पूछने से जुड़ा है कि “कौन चल रहा है?”

तो, यातायात से जुड़े शोध आपको बताएंगे कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम और छोटी-छोटी यात्राएं करती हैं. वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल बहुत कम करती हैं. शहर में भी उनका दायरा सीमित ही रहता है. वे ज़्यादातर पैदल यात्रा करती हैं, कम दूरी की यात्रा करती हैं, कम अवधि की यात्रा करती हैं.

चित्र साभार: शिवम रस्तोगी

छात्रों के एक समूह ने एक महीने तक 10 घरेलू कामगारों का अनुसरण किया और उनके यात्रा करने के पैटर्न को समझने के लिए गतिशीलता मानचित्र तैयार किया. वे कब स्विच करते हैं? वे कब जाते हैं? बहुत ही खूबसूरत ढंग से उनका दृश्यात्मक रोज़नामचा तैयार किया गया. एक अन्य समूह ने किराए की आवास व्यवस्था का पर्यवेक्षण करना शुरू किया और हमने क्या देखा? हमने पाया कि चूंकि ये घरेलू कामगार काम करने के लिए मध्यवर्गीय कॉलोनियों में पैदल ही आती-जाती थीं, इसलिए उन्हें मध्यवर्गीय कॉलोनियों के आसपास ही रहना पड़ता था. किफायती आवास शहर के सरहदी इलाकों में थे, जहां वे नहीं रह सकती थीं. उन्हें उन मध्यम और उच्च मध्यम वर्गीय घरों के अगल-बगल में ही रहना पड़ता था, और इसलिए अन्य अनियमित श्रमिकों की तुलना में वे अधिक किराया देती थीं. इस प्रकार, घरेलू कामगारों की किराया स्थिति स्थानिक आधार पर अलग-अलग होती है. बहुविषय नज़रियों से खोजबीन करने से ही ये संभव हो सका.

अब, एक ऐसे सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की कल्पना करें जिसमें वे जहां भी हों वहां से कुशलतापूर्वक और किफायती रूप से काम के लिए आ-जा सकें. यदि ऐसा होता है तो उनके मकान किराए में 30% की कमी आएगी. लेकिन जब तक वैसी परिवहन व्यवस्था आ नहीं जाती, तब तक ऐसा होना सम्भव नहीं है. जब केजरीवाल कहते हैं कि हम महिलाओं को बस में मुफ्त सफर करने की सुविधा देंगे तो लोगों को लगता है कि यह एक तरह की चाल है. दरअसल उन्हें यह समझ में नहीं आता कि यह परिवहन रणनीति के रूप में नहीं बल्कि आर्थिक विकास की रणनीति के रूप में कितनी महत्त्वपूर्ण है.

हमारा देश, दुनिया में महिला कार्यबल भागीदारी की सबसे कम दरों वाले देशों में से एक है और पिछले 15 वर्षों में, जबकि हमारी जीडीपी बढ़ रही है, इसमें गिरावट ही आई है. यह कभी 32% हुआ करता थी जो अब घटकर 28 फीसदी पर आ गई है. चीन में महिला कार्यबल भागीदारी की दर 55 फीसदी है. सऊदी अरब में यह दर 38% है. और हम, 28% पर अटके हुए हैं.

हर बार, जहां भी मैं पढ़ाने जाता हूं, मैं छात्रों की ओर देखता हूं और कहता हूं, ज़रा मुझे यह बताओ कि हमारे श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी इतनी कम क्यों है? और यह लगातार कम क्यों हो रही है? और तब जो बात उभरकर सामने आती है, वह है: पितृसत्ता, बच्चों की देखभाल, परिवहन, उपलब्ध नौकरियों की प्रकृति, शिक्षा.

तो आप जानते हैं, समय-समय पर आपको एक डेटा प्वॉइंट मिलेगा जो कि उस धागे की तरह है जो आपकी शर्ट से बाहर उभरा या निकला हुआ है, और अगर आप इसे खींचते हैं तो पूरी बात सुलझ जाती है. ये डेटा प्वॉइंट, और इस तरह की चीज़ें, हम पकड़ने की कोशिश करते हैं और अपने छात्रों को पकड़ना सिखाते हैं. धागों को आपस में जोड़ने वाली चीज़ को ढूंढो और उसे खींचो क्योंकि अगर महिला श्रमबल की भागीदारी बढ़ती है, तो बाकी सभी चीज़ों का व्यवस्था में काम करना खुद-ब-खुद शुरू हो जाएगा.
चित्र साभार: शिवम रस्तोगी

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद गौतम. बस मेरा एक आखिरी सवाल है, चूंकि हमने क्रोध से शुरुआत की थी कि यह एक भावना है और इसे शैक्षणिक रूप से कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, मैं सोच रही थी, अगर एक शिक्षक के रूप में, व्यक्तिगत अर्थों में, कुछ अन्य भावनाएं कौन सी हो सकती हैं जिनका आपने शैक्षणिक रूप से इस्तेमाल किया हो या प्रसारित किया हो?

मैं खुश रहने, आनंद से रहने में यकीन रखने वाला व्यक्ति हूं. मनोरंजन मुझे बहुत पसंद है. मुझे लगता है कि इसका उपयोग, शैक्षणिक रूप से और सीखने-सिखाने के रूप में बहुत कम किया गया है. मुझे लगता है कि समानुभूति का होना बहुत मुश्किल है, अगर इससे आपको खुशी नहीं मिलती तो. एक बात जो समानुभूति को करुणा या दयाभाव से अलग करती है वह यह है कि आप खुशी के साथ समानुभूति भी रख सकते हैं.

वास्तव में एक शैक्षणिक उपकरण और सीखने-सिखाने के रूप में मनोरंजन को कमतर आंका गया है. किसी काम को करने में एक मज़ा है, सामूहिक जीवन में आनंद है, दोस्ती में उल्लास है. और उल्लास के लिए शिद्दत और इसमें विश्वास की ज़रूरत होती है.

जब मैं युवा क्वीर लोगों से बात करता हूं, उदाहरण के लिए, वे पूछते हैं, “हम बूढ़े कैसे होते हैं?” मैं हमेशा उनसे यही कहता हूं कि “मैं आपको यह नहीं बता सकता. लेकिन मैं आपको यह ज़रूर बता सकता हूं कि मैं कैसे बूढ़ा हुआ. किसी समय, हममें से एक समूह ने फैसला किया कि हम अपनी सारी मेहनत दोस्ती में लगा देंगे. और हम इसे रोमांस पर प्राथमिकता देंगे.” कभी ये बातें हुई थीं और हमारे लिए यह बहुत मायने रखता है.

हम दोस्त साथ रहे हैं. हमने पार्टनरों को आते और जाते देखा है. हमारे दिमाग में ये बात बहुत स्पष्ट है – केवल वही लोग हमारे साथ रोमांटिक रूप से रह सकते हैं जो हमारे जीवन में प्राथमिक नहीं बनना चाहते हैं. और हर किसी की तरह एक ही दर्जे पर रहने को तैयार हैं. लेकिन दोस्ती जो खुशी देती है, उसके बिना आपको चलते रहने के लिए ऊर्जा और कहां से मिलेगी?

यदि आप खुशियों को एकत्रित नहीं कर सकते तो आप सहानुभूति और क्रोध और करुणा को भी संगठित नहीं कर सकते. हम केवल क्रोध और करुणा से प्रेरित नहीं हो सकते. हमें खुशी और आनंद से भी प्रेरित होना होगा. खुशियों को व्यक्त करना कठिन है, लेकिन मैं इसका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं. मैं अपने छात्रों से हर समय पूछता हूं, जब कभी वे आते हैं और बहुत सी चीज़ों के बारे में बातें करते हैं, और मैं कहता हूं कि अच्छी बात है कि सब ठीक है, बस मुझे ऐसी दो बातें बताओ, जिनसे तुम्हें खुशी मिलती है. जो चीज़ आपको खुशी देती है, उसके बारे में आपको कुछ अभिव्यक्ति रखनी होगी. वो नहीं है तो भैया मर-मर के घुट-घुट के ज़िंदगी जियोगे. इसका कोई मोल नहीं है. आनंद के बिना इंसाफ नहीं आ सकता.

इस लेख का अनुवाद अकबर रिज़वी ने किया है.

शबानी हसनवालिया द थर्ड आई की संपादक हैं.

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