संपादकीय

अंक 005

अपराध

January 2024

जब हमने नारीवादी नज़रिए से अपराध को देखने के बारे मे सोचा तो पहला सवाल यही था कि आखिर इसका मतलब क्या है? अपराध से हम क्या समझते हैं? कौन है जो अपराधी कहलाते हैं? विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ ‘अपराध’ को उजागर करने, उसके उन्मूलन से जुड़े नए कानूनों के निर्माण और प्रभावी रूप से उसके लागू होने को लेकर नारीवादी संघर्ष बहुत लंबा है, ऐसे में उनकी नज़र में ‘अपराध’ का क्या मतलब होता है? क्या अपराध को देखने के नए तरीके भी हैं? और क्या कारावास ही आगे का रास्ता है? हमारी मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणालियां – कानून, अदालतें और संस्थाएं – जो अपराध और न्याय देने की प्रक्रिया को परिभाषित करती हैं उनकी सीमाएं क्या हैं? क्या अपराध को देखने की अन्य कल्पनाएं भी हो सकती हैं? और किस तरह के विरोधाभास हमें दिखाई देते हैं जब हम उम्र, जाति या धर्म के आधार पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को देखने की कोशिश करते हैं?

इन सवालों और विचारों से जुड़े अलग-अलग आख्यानों और बहसों को सामने लाने के लिए हमने विद्वानों, शोधकर्ताओं, जेलों पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और कानून एवं उसकी नीतियों पर काम करने वाले अभ्यासकर्ताओं, क्राइम रेपोर्टरों, लेखकों और विचारकों से बात की जो सामने आया वो कुछ अनछुए रास्ते थे जो हमें न सिर्फ़ विस्मित कर रहे थे बल्कि उन्होंने हमें प्यार और संभावनाओं से भी भर दिया.

हम अपराध की आधारणाओं और इसके आसपास के शोर से इतर देखने और सोचने के लिए प्रेरित हुए. आम और वैधानिक समझ अपराध को कानून, समाज और राज्य की नज़र से परिभाषित करती है. आपराधिक न्याय प्रणाली, अपराधी और पीड़ित के खांचें में रखकर अपराध का संज्ञान लेते हुए सज़ा का प्रावधान तय करती है लेकिन नारीवादी नज़रिया महज़ अपराध पर केंद्रित नहीं होता. वह इसकी प्रकृति, परिस्थितियों और कारणों की भी पड़ताल करता है. समता और देखभाल की नैतिकता को केंद्र में रखते हुए यह दुनिया को देखने के मर्दवादी “सही” तरीके और उचित, अनुचित एवं नैतिकता के विचारों को चुनौती देता है.

अपराध को देखने के नारीवादी नज़रिए ने हमें संरचानाओं और उनके मापदंडों पर सवाल करने की अनुमति दी. कोई अपराधी कैसे बनता है? और किन कारणों से वह अपराधी बनता है? हमें यह पूछने पर बाध्य किया कि आखिर वे कौन लोग हैं जो जेल जाते हैं? किसे सुरक्षित रखा जाता है और किससे? इसने हमें प्रतिरोध की उन आवाज़ों का दस्तावेज़ीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जिन्हें तोड़ने की हर संभव कवायत की जाती है. यह उन छवियों, दृश्यों और भाषाओं की परतों को उघाड़ने का काम करता है जिसका आधार पाकर पितृसत्ता नए रूपकों और रंगों में अपने को गढ़ती है. साथ ही इसने हमें संभावनाओं की उन रोशनियों की ओर देखने के लिए प्रेरित किया जो मानकों के खांचों को तोड़कर अपनी बात कह रहे हैं.

हमारा यह अपराध संस्करण, पिछले साल के हमारे काम ‘हिंसा की शब्दावली’ का एक विस्तार भी है. अपने काम के ज़रिए केसवर्कर्स भी यही सवाल उठा रही हैं कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा से हम कैसे निपटते हैं? आखिर में किसी को ‘अपराधी’ साबित कर देना ही क्या इसमें आगे बढ़ने का एक मात्र रास्ता है? यह अपराध को देखने का वही नज़रिया था जिसकी पड़ताल हमारे संस्करण के मूल में स्थापित है.

उत्तर-प्रदेश के गांवों, कस्बों और शहरों में हिंसा के मुद्दों पर दशकों से काम करने वाली केसवर्कर्स के साथ मिलकर हमने ‘हिंसा की शब्दावली’ तैयार की जिसने जेंडर आधारित हिंसा के मुद्दों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों की एक नई दुनिया हमारे सामने खोल दी. केसवर्कर्स, रोज़मर्रा में शामिल हिंसा की घटनाओं के एक आम घटना बन जाने की प्रक्रिया की तरफ हमारा ध्यान खींचती हैं. इस संस्करण के ज़रिए मिलिए दो केसवर्कर कुसुम और राजकुमारी से जो जेंडर आधारित हिंसा में समझौता शब्द के अर्थ विस्तार के बारे में बता रही हैं.

इस संस्करण में हम हिंदी की मूल कहानियों के ज़रिए भी अवधारणाओं पर बात करने की कोशिश कर रहे हैं. इस कड़ी में सबसे पहले हम सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक सीमा आज़ाद की किताब ‘औरत का सफर’ से ‘कुन्तला’ की कहानी आपसे साझा कर रहे हैं. सीमा कहती हैं, “कैद के भीतर और कैद के बाहर, महिलाओं की ज़िंदगी लगभग एक जैसी है.”

इसी तथ्य को अपनी किताब ‘विमेन इनकार्सरेटेड: नैरेटिव फ्रॉम इंडिया’ में महुआ बंद्धोपाध्याय और रिम्पल मेहता भी उजागर करती हैं. महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलु, कैद और इसके विविध आयामों पर अलग-अलग लेखों के ज़रिए विस्तार से बात करते हुए वे कहती हैं, “महिलाओं के संबंध में सामाजिक नियंत्रण, निगरानी और उन्हें घर के भीतर कैद रखना, ये वही निरंतरता है जो दोनों जगहों पर काम करती है.”

अपने लेख ‘हिंसा की तलाश थी और प्यार मिल गया’ में जेल के भीतर बंद महिलाओं की कहानियों के ज़रिए महुआ और रिम्पल हमें इस ओर देखने पर मजबूर करती हैं कि आखिरकार जो लोग जेल जाते हैं वे वास्तव में कौन हैं? वे हाशिए पर धकेल दिए और अति वंचित लोग हैं. इस बात पर विस्तार से रौशनी डालते हुए इस संस्करण के एक अन्य लेख ‘अपराध को देखने का नारीवादी नज़रिया क्या है?’ में प्रोजेक्ट 39 ए से जुड़ी मैत्रयी मिसरा हमें बताती हैं कि इसे समझने के लिए हिंसा की एक खास घटना, एक विशिष्ट क्षण से थोड़ा पीछे हटकर अपराधी के संदर्भों के साथ-साथ उन बड़े संदर्भों को भी देखना होगा जिसमें अपराध स्थित था.

और जवाबदेही, माफ़ी और नुकसान की भरपाई पर आधारित न्याय व्यवस्था क्या आपराधिक न्याय प्रणाली के सज़ा के प्रावधानों से अधिक बेहतर है? भविष्य को लेकर परिवर्तनकारी सोच रखने वाली नारीवादी लेखक शालोम गौरी और कुशल चौधरी हमें पुनर्स्थापनात्मक न्याय/ रेस्टोरेटिव जस्टिस की विस्तृत संभावनाओं के बारे में विस्तार से बताते हैं.

अपराध से जुड़े लोगों को उस दुनिया से बाहर निकालने से जुड़े कई सुधारवादी तरीके हैं. इसमें एक है यौन कर्मियों को वापस समाज में शामिल करने से जुड़ा प्रयास. हालांकि यह प्रयास भी अपने आप में बहस का मुद्दा है, पर फिलहाल टाटा समाज विज्ञान संस्थान (TISS) से जुड़ी शेरोन मेनेजेस हमें इन ‘पुनर्वास’ मॉडलों की खामियों को देखने में मदद कर रही हैं. अपने निबंध ‘दो दुनियाओं के बीच’ के ज़रिए वे हमें यौनकर्मियों द्वारा अपने स्वयं के पुनर्वास के संबंध में दिए गए कुछ महत्त्वपूर्ण अनुभवों और तर्कों से परिचित कराती हैं.

इस संस्करण के मुख्य आकर्षणों में निरंतर रेडियो का बिलकुल नया शो ‘F – रेटेड इंटरव्यू‘ है. इस शो के पहले सीज़न में हम भारत की कुछ बेहतरीन महिला क्राइम रिपोर्टरों से बात कर रहे हैं, जो अपनी बातचीत में जेंडर अध्ययन, पत्रकारिता के अपने अनुभव और जीवन के अनुभवों को साथ ला रही हैं. पहले सीज़न के पहले एपिसोड में मिलिए चर्चित पत्रकार प्रियंका दूबे से जिन्होंने पत्रकारिता के अपने 14 साल के करियर में हिन्दुस्तान टाइम्स, तहलका एवं कारवां पत्रिका, एवं बीबीसी इंडिया के साथ काम करते हुए शानदार रिपोर्टिंग की है जो प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुई है. हाथरस की घटना पर आधारित उनकी रिपोर्ट, आगे चलकर उनकी किताब ‘नो नेशन फॉर विमेन’ का केंद्र बनी.

इन सारी बहसों के बीच पाकुर, झारखंड से हमारे डिजिटल एजुकेटर्स अशरफ और अजफरूल ‘पत्थर खदान’ के नाम से मशहूर इस इलाके से कुछ मौलिक सवालों को फिर से हमारे सामने लाते हैं जैसे- अगर प्रकृति के साथ कुछ बुरा होता है तो क्या वो अपराध कहलाएगा? लर्निंग लैब के अंतर्गत देखिए उनकी वीडियो प्रस्तुति.

हिंदी में अपराध पर नारीवादी नज़रिए से बात हो ये बहुत कम पढ़ने-जानने को मिलता है. इसलिए यह संस्करण खास है क्योंकि हम अंग्रेज़ी में विविध क्षेत्रों में चल रही बहसों को भी सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं. पहले चरण में प्रकाशित हमारे सभी लेखों में सुधार बनाम उन्मूलन को लेकर बहस सामने आई है. हम इस संस्करण के ज़रिए नारीवादी नैतिकता के साथ-साथ कानून की जटिल सीमाओं पर भी बात कर रहे हैं. अंग्रेज़ी की एक मशहूर प्रोफेसर मारी मत्सुदा के शब्दों में कहें तो हमारा अपराध संस्करण भविष्य की ओर सकारात्मक संभावनाओं से देख रहा है. एक ऐसी संभावना जहां एक तरफ हम खुलकर कह सकें कि जब तक हमारी अदालतें विशेषाधिकार से ग्रस्त हैं, तब तक न्याय संभव नहीं है और दूसरी तरफ यह संस्करण सत्य को सत्ता के सामने रखते हुए, कानून से मौलिक मूल्यों को बनाए रखने का आग्रह करता है.

अंत में सारा सफ़ारी के शब्दों में, “हमें लगातार नया बनना होगा. अपने मन की बात को दुनिया के सामने चीख कर कहने का माद्दा पैदा करना होगा. लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता चुनौतियों से भरा हुआ है. कई बार ऐसी बाधाएं आती हैं जिन्हें पार कर पाना नामुमकिन लगता है. लेकिन मनुष्य की क्षमता असीम होती है. सीमाएं सिर्फ दिमाग के भीतर होती हैं.”

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