क्या किसी अपराधी द्वारा माफी मांग लेना, उसे जेल भेजकर सज़ा दिलाने से ज़्यादा न्यायपूर्ण है?

पुनर्स्थापनात्मक न्याय से हम क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ में इसे कैसे देखा जा सकता है?

दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल की महिला कैदी शकीरा की कलाकृति, एक प्रदर्शनी 'ए ब्रश विद होप' (उम्मीद से भरा एक ब्रश) में. फोटो साभार: www.thevillagegallery.in

दो भागों में प्रकाशित यह लेख पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रेस्टोरेटिव जस्टिस से हम क्या समझते हैं, इसकी संभावनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से हमें बताने का प्रयास करता है. खासकर भारत के संदर्भ में जहां पुनर्स्थापनात्मक न्याय लगातार चर्चा का विषय है, यह लेख अपराध और सज़ा को अधिक मानवीय नज़रिए से देखने को लेकर हमारे विचार की सीमाओं को विस्तार देने का काम करता है. लेख का पहला भाग पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रेस्टोरेटिव जस्टिस के दुनिया में उभार पाने, भारत में किशोर न्याय कानून के साथ समानता, यौन अपराधों में भूमिका एवं मध्यस्तता से बिलकुल अलग होने के बारे में है.

फोटो साभार: Thecurrent.pk

2022 में, पाकिस्तान की सालाना औरत मार्च का विषय था इंसाफ की पुनर्कल्पना, जिसके घोषणापत्र में आपराधिक न्याय प्रणाली की नाकामयाबियों पर रोशनी डाली गई. इसके साथ मार्च में “देखभाल की नारीवादी संस्कृति की सोच” के निर्माण पर ज़ोर दिया गया था. यह मानते हुए कि ऐसी सोच एक व्यक्ति से परे संरचनात्मक हिंसा को संबोधित करने का दम रखती है. यहां ‘देखभाल’ शब्द, को ‘स्त्रियोचित गुणों की रूढ़िवादी समझ से अलग करके सामूहिक ज़िम्मेदारी के रूप में इसकी कल्पना करने’ की बात है.

जैसे-जैसे नारीवादी आंदोलनों ने जाति, वर्ग, यौनिकता, नस्लीय-स्पष्टता, विकलांगता और अन्य हाशिए के भेदभाव के साथ जेंडर की परत-दर-परत अन्याय का संज्ञान लिया, इंसाफ की पुनर्कल्पना करने का यह काम हमारे संघर्ष का केंद्र बन गया है. इंसाफ की पुनर्कल्पना का मतलब संरचनात्मक हिंसा से लड़ना और देखभाल की प्रणाली का निर्माण करना है. यह कभी न खत्म होने वाली जेंडर आधारित हिंसा और यौन अपराध की प्रतिक्रिया में और इस समझ से निकला है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं वह सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से उत्पीड़न करने और उसे कायम रखने के लिए बनाई गई है. जेलों में महिलाओं की तादाद में चिंताजनक इज़ाफ़े ने भी इसे उभारने का काम किया.

सभी जेलों में औरतों की संख्या मर्दों के मुकाबले कम है. मगर दुनियाभर की जेलों में औरतों की संख्या मर्दों के मुकाबले ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है. फोटो साभार: penalreform.org

जैसा कि अमेरिका स्थित नारीवादी संगठन आईएनसीआईटीई – INCITE! ने अपने एक बयान में कहा है – मुख्यधारा के हिंसा विरोधी आंदोलन, औरतों के खिलाफ़ हिंसा को खत्म करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हैं. लेकिन अपराधीकरण का यह नज़रिया न केवल अपराध को कम करने में नाकाम रहा है, बल्कि कई महिलाओं को सक्रिय रूप से कानून के साथ तनावपूर्ण स्थिति में ले आया है. इसमें खासतौर पर अश्वेत महिलाएं, गरीब, समलैंगिक और ट्रांस महिलाएं, यौनकर्मी, अप्रवासी महिलाएं, विकलांग और हाशिए पर रहने वाली अन्य महिलाएं शामिल हैं. भारत में, यह दलित, बहुजन, आदिवासी और विमुक्त (डीबीएवी) महिलाओं के लिए भी खासतौर पर सच है. यहां तक की 1952 में आपराधिक जनजाति अधिनियम के निरस्त होने के बावजूद, नस्लवादी और जातिवादी धारणाएं पुलिस और न्यायपालिका में अभी भी व्याप्त हैं. यह जानते हुए कि हाशिए की इन पृष्ठभूमि के मर्दों को भी असमान रूप से जेलों में रखा जाता है, अंतत: उनके परिवारों की औरतों को ही इसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है क्योंकि वित्तीय, भावनात्मक और शारीरिक बोझ उठाने के लिए वे मजबूर हैं.

यह तथ्यात्मक रूप से सच है कि अपराधीकरण, अपराध को रोकने का काम नहीं करता है और हाशिए पर मौजूद औरतों पर इसका उलटा असर डालता है. इस तथ्य ने नारीवादी आंदोलन को ज़रूरी सवालों की जांच करने के लिए प्रेरित किया – सबसे पहले तो यही कि आखिर अपराध की वजह क्या है? कैद के भीतर हाशिए पर रहने वाली औरतों और उनके परिवारों की संख्या में इतनी असंगति क्यों है? और हम न्याय की पुनर्कल्पना कैसे करें ताकि हम समस्या की जड़ पर चोट करें और उत्पीड़न से लड़ सकें. इन सवालों के जवाब देने की प्रक्रिया में नारीवादी समूह जिन नज़रियों की खोज कर रहे हैं उनमें से एक है – मज़बूत इंसाफ यानी रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय. इस लेख में हम उन समस्याओं को समझने की कोशिश करेंगे जिन्हें भारत में पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रेस्टोरेटिव जस्टिस को लागू करने वाले संबोधित करने का प्रयास कर रहे हैं और ज़मीनी स्तर पर इसे लागू करने का क्या मलतब है.

आपराधिक न्याय प्रणाली जो पश्चिमी देशों में पैदा हुई और साम्राज्यवादी तंत्र के ज़रिए पूरी दुनिया पर थोप दी गई, असल में दो बुनियादी मान्यताओं पर टिकी है. पहली मान्यता दंड देने के दर्शन से जुड़ी है जो अपराध करने वाले के लिए यानी कानून तोड़ने वाले के लिए ‘जायज़’ कठोर सज़ा की वकालत करती है. दूसरी, जेल के सुधारात्मक प्रभाव और प्रायश्चित्त में यकीन करती है. वहीं, पुनर्स्थापनात्मक न्याय/ रेस्टोरेटिव जस्टिस का नज़रिया अक्सर अमेरिका के मूल निवासियों के साथ-साथ माओरी जनजातियों में भी पाया जाता है. यह अपराध को किसी व्यक्ति और/या समुदाय को हुए नुकसान के रूप में देखता है और इस बात पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करता है कि हालात को कैसे बेहतर तरीके से सुधारा जाए. साथ ही जिन लोगों को नुकसान पहुंचा है उन्हें एक मौका दिया जाए कि वे अपनी पहचान और संवाद के ज़रिए बता सकें कि इससे उभरने में उनके लिए क्या चीज़ें कारगर हो सकती हैं.

नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति को सुधारने के साधन के रूप में बतौर सज़ा और पीड़ा के बजाय, यह जवाबदेही, माफी और नुकसान की भरपाई पर ध्यान देने की कोशिश करता है.

इन दोनों ही प्रणालियों में एक मूलभूत अंतर यह है कि दंडात्मक नज़रिया अपराधियों को उनके द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को स्वीकार करने से हतोत्साहित करता है, वहीं रेस्टोरेटिव जस्टिस / पुनर्स्थापनात्मक न्याय का नज़रिया इसे प्रोत्साहित करना है. 

पर उपचार, देखभाल और न्याय के विचारों को लेकर रेस्टोरेटिव जस्टिस / पुनर्स्थापनात्मक न्याय का दृष्टिकोण जटिल है, आइए इसके बुनियादी सिद्धांतों पर नज़र डालते हैं.

आपराधिक न्याय प्रणाली में, अपराध करने पर सज़ा देने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से राज्य पर होती है. और सज़ा की प्रकृति क्या होगी इसका प्रावधान राज्य के कानूनी एजेंटों द्वारा किया जाता है. लेकिन पुनर्स्थापनात्मक नज़रिया जिन्हें चोट पहुंची है उन्हें केंद्र में रखकर, यह निर्धारित करने की प्रक्रिया में शामिल करता है कि हुए नुकसान की मरम्मत के लिए क्या किया जा सकता है. यह पीड़ित-अपराधी के परंपरागत खांचे से परे जाकर उन लोगों को भी इसमें शामिल करता है जो अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान से प्रभावित होते हैं (जैसे परिवार के सदस्य, सहपाठी या उदाहरण के लिए पड़ोसी). इसमें यह भी है कि नुकसान पहुंचाने वालों की ओर से जिन तराकों की पहचान की जाती है उनकी भी बारीकी से जांच की जानी चाहिए. कानून और राज्य की दबंगई प्रणाली दरअसल सभी लोगों को इंसाफ के एकमात्र ज़रिए – प्रतिशोधात्मक न्याय पर निर्भर रहने के लिए अनुकूलित करती है. इस तरह पीड़ित और उनके परिवार इंसाफ की तलाश में कड़े दंडात्मक उपायों की मांग कर सकते हैं. और उन्हें भी इससे जोड़ती है जिन्होंने हानिकारक व्यवहार को बढ़ावा दिया या इसे रोकने में नाकाम रहे. इसके साथ यह इस बात को भी मानने की गुंजाइश देती है कि जो लोग नुकसान पहुंचाते हैं वे अक्सर खुद को नुकसान पहुंचा चुके होते हैं. इसलिए अपराध या नुकसान पहुंचाने की ज़िम्मेदारी व्यक्ति और संबंधित समुदाय की समझी जाती है.

‘इंसाफ’ (जस्टिस) नाम की एक लघु कहानी है. इसमें, संयुक्त राज्य अमेरिका की एक उन्मूलनवादी नारीवादी, मरियम काबा, आत्मनिरीक्षण करने वाले समुदाय की कल्पना करती हैं. यह समुदाय ‘स्मॉल प्लेस’ नाम की दुनिया में स्थित है. एक ऐसी जगह जहां ‘इंसाफ का मतलब बदला नहीं है’. कहानी में एक ऐसे समुदाय की कल्पना है जो नुकसान को इंसानी ज़िंदगी के एक पहलू के रूप में देखता है, जिसपर ज़रूरी है कि हर कोई ध्यान दे. कहानी की नायक आदिला कहती है, “स्मॉल प्लेस में रहने के बारे में मुझे जो सबसे ज़्यादा पसंद है वह यह कि यहां हम एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं. जब हमारे समुदाय में किसी व्यक्ति को नुकसान होता है, तो हम सभी को नुकसान होता है. यह हमारे सबसे पवित्र और ज़रूरी मूल्यों में से एक है.”

कहानी ‘न्याय’ (जस्टिस) लेखक मरियम काबा. बियांका डियाज़ द्वारा चित्रित.

अपराध के बजाए नुकसान, पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रेस्टोरेटिव जस्टिस का मूल है.

इंसाफ को लेकर हमारे नज़रियों की जड़ें सामूहिक देखभाल और जवाबदेही में बसी होनी चाहिए, नहीं तो हम अपनी ‘आम इंसानियत’ को भूल सकते हैं. काबा का यही पैगाम है.

“पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रेस्टोरेटिव जस्टिस की प्रक्रियाएं ऐसी हैं जिनमें नुकसान से सबसे ज़्यादा प्रभावित पक्ष किसी मध्यस्थ की मदद से साथ आते हैं और हो चुके नुकसान की भरपाई पर काम करने की कोशिश करते हैं. ये प्रक्रियाएं 1) अपराध से उपजी ज़रूरतों, 2) नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति के दायित्वों और 3) अपराध के होने के कारणों पर विचार के ज़रिए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करती हैं.”

– काउंसिल टू सेक्योर जस्टिस (सीएसजे) द्वारा अक्सर पूछे जाने वाली प्रश्न-पुस्तिका से.

यह कई तरह से हो सकती है. इनमें से कुछ हैं:

  1. बातचीत – जिन्हें नुकसान पहुंचा है और जो इसके लिए ज़िम्मेदार हैं उनके बीच,
  2. मंडलियां – इनमें समुदाय शामिल होता है और एक के बाद एक सभी को अपनी बात रखनी होती है ताकि हर किसी को अपना नज़रिया पेश करने का मौका मिले. ज़रूरत के मुताबिक कई तरह की मंडलियां जैसे जिनका नुकसान हुआ उनकी मंडली, सुनने वालों की मंडली, शांति बहाल करने वालों की मंडली, सज़ा देने वालों की मंडली वगैरह आयोजित की जाती हैं.
  3. कॉन्फ्रेंसिंग कार्यक्रम – यह मंडलियों की तरह ही होता है लेकिन एक के बाद एक की बोलने की बारी के बजाय, कौन कब अपनी बात रखेगा यह मध्यस्थ तय करता है और सवाल पहले से तय होते हैं.

यौन अपराध के मामलों में पुनर्स्थापनात्मक न्याय / रिस्टोरेटिव जस्टिस

“…अनुभव और व्यापक अध्ययन हमें दिखाता है कि मौत की सज़ा और अपराध में कमी के बीच कोई रिश्ता नहीं है. अपराधियों के लिए अमानवीय भाषा का इस्तेमाल करना, उन्हें “राक्षस” और “जानवर” करार देते हुए उन्हें मौत के काबिल समझना सिर्फ़ और सिर्फ़ एक व्यक्ति द्वारा किए गए कृत्यों से उपजी हिंसा और अपराध की बात करना है. असल में ऐसी घटनाओं को गैरबराबरी, मौकों की ऐतिहासिक कमी, लैंगिक रूढ़ियां और अपेक्षाएं, गरीबी और अलगाव जैसे पेचीदा सामाजिक चालकों के नतीजों के रूप में रखा जाना चाहिए.” 

– 2022 के औरत मार्च के घोषणापत्र से.

मथुरा मामले (1972) से लेकर विशाखा (1997), निर्भया (2012), शक्ति मिल्स (2013) और #मीटू (2017) तक के मामलों में, भारतीय नारीवादी आंदोलनों ने कानूनी सुधार, अपराध की पहचान और मौजूदा कानूनी उपायों के इस्तेमाल को लेकर बार-बार संघर्ष किया है. निर्भया जैसे मामलों में जहां जन-आक्रोश ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं मीडिया की बयानबाज़ियों ने जल्द ही इसे इज़्ज़्त और बदले की भावना में तब्दील कर दिया. देश में औरतों का अपमान जितने बड़े स्तर का होगा, सज़ा भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए और इस तरह राज्य ने आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के साथ अपना जवाब दिया. इसमें जघन्य यौन हिंसा के मामलों में मौत की सज़ा का प्रावधान किया गया. लेकिन यह नारीवादी समूहों की मांग नहीं थी.

यहां तक कि ऐसे मामलों में जहां नारीवादी कानूनी सुधार हासिल किया गया है, तथ्य यह है कि यौन हिंसा की शिकार ज़्यादातर सर्वाइवर अपराध की रिपोर्ट नहीं कराना चाहती हैं. कुछ हद तक यह कानूनी प्रक्रियों के लिए ज़रूरी वक्त और पैसे के चलते होता है – अदालतों में बड़े पैमाने पर लटके पड़े मामलों, कानूनी फीस और सुनवाई (जो साल में केवल एक या दो बार हो पाती है) और फैसले (जिसमें औसतन 3 साल लगते हैं) इसकी वजह हैं. रिपोर्ट न लिखवाने की दूसरी सबसे बड़ी वजह बलात्कार से जुड़ी संस्कृति है. हम ऐसे समाज में पले-बढ़े हैं जिसमें न केवल सेक्स के बारे में बात करना वर्जित है, बल्कि जहां यौन शोषण को सामान्य बना दिया जाता है और चुप करा दिया जाता है और जहां दूसरों के शरीर के प्रति असम्मान की भावना को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया और प्रोत्साहित किया जाता है. पीड़ितों को अपने ही परिवारों, व्यापक जनता, मीडिया, पुलिस और न्यायाधीशों सहित कानून का पालन कराने वाले एजेंटों से उत्पीड़न, हिंसा और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है. इसलिए समस्या के सांस्कृतिक स्तर पर काम करना ज़रूरी है.

1977 में, सांता क्रूज़ वीमेन अगेंस्ट रेप ने बलात्कार विरोधी आंदोलन को एक खुला खत लिखा:

“इसका जवाब केवल बलात्कारियों को सड़क से हटा देना नहीं है.” जेलें खुद बलात्कारियों को बदलने में नाकाम हैं. जेल की संस्कृति काफी हद तक बाहरी दुनिया की तरह ही है, जहां दबाव बहुत बढ़ जाता है. पुरुष की यौन भूमिकाएं, हिंसा और सत्ता के साथ उनका संबंध, जो बलात्कार की वजहों में शामिल हैं, जेल के भीतर ये और ज़्यादा मज़बूती पाते हैं. जेल में बलात्कारी, बलात्कार करना बंद नहीं करते, वे बस अपने से कमज़ोर मर्दों पर अपनी ताकत चलाते हैं. जेलें समस्या की जड़ों से निपटने का काम नहीं करतीं, वे केवल कारणों को बढ़ाती हैं. जेल से बाहर आने वाले मर्दों ने औरतों से रिश्ता रखने के नए तरीके नहीं सीख लिए हैं और न ही इस बात का विश्लेषण किया है कि वे बलात्कार क्यों करते हैं या कैसे इसे बदलना है. मुमकिन है कि वे फिर से बलात्कार करेंगे. जेंडर के प्रति नकारात्मक नज़रिए (और उससे जुड़ी क्रियाओं) को कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता है. (पेज 11)

यौन अपराध पर बात करते वक्त ध्यान देने लायक एक अतिरिक्त तथ्य यह है कि ज़्यादातर मामलों में अपराधी, सर्वाइवर के परिचित होते हैं. भारत में बाल यौन शोषण (सीएसए) के बढ़ते मामलों के जवाब में सामाजिक न्याय संगठन की शुरुआत की गई थी. 2018 की एक रिपोर्ट में, उन्होंने दर्ज किया:

“2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला कि साक्षात्कार में शामिल 53.2 फीसदी बच्चों को यौन शोषण का सामना करना पड़ा और 20.9 फीसदी बच्चों को गंभीर यौन शोषण का सामना करना पड़ा. यह समस्या सभी जेंडर के साथ समान है: लड़कियों की तुलना में ज़्यादा लड़कों ने यौन शोषण का खुलासा किया. हालांकि, 2016 में पूरे देश में, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत बाल बलात्कार के केवल 19,765 मामले और पोक्सो के तहत यौन अपराध के महज़ 36,022 मामले पुलिस में दर्ज किए गए थे.”

सच यह है कि भारत में बाल यौन शोषण के 95 फीसदी मामलों में ऐसे लोग शामिल होते हैं जो बच्चे के परिचित होते है. सेक्स को लेकर कलंक की अटूट भावना, परिवार की इज़्ज़्त का सवाल, पीड़ित को दोष देना और इस तरह की घटनाओं पर विश्वास ही न करना, कम रिपोर्टिंग के इस बड़े मुद्दे की सभी मुमकिन वजहें हैं. रिपोर्ट में फील्ड में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के अनुभवों से हासिल सबक शामिल किए गए हैं, और यह भी कहा गया है कि मौजूदा प्रणाली इन हमलों के शिकार लोगों के लिए शायद ही कोई रास्ता सुझाती है जिसमें वे मामलों को खत्म करके आगे बढ़ें.”

राही फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक अनुजा गुप्ता का कहना है, “बाल यौन शोषण के शिकार लोग दरअसल अपने साथ बुरा बर्ताव करने वाले व्यक्ति से जुड़े रहना पसंद कर सकते हैं. ऐसा माना जाता है कि लोग रिश्ता तोड़ना चाहते हैं, जो कई मामलों में सच है. लेकिन मैंने अनाचार के मामलों में काफी ज़्यादा पाया है, जहां रिश्ता बहुत करीबी होता है वे इस बात की तलाश कर रहे होते हैं कि बस ये बुरा बर्ताव रुक जाए, या अगर वह पहले ही बंद हो चुका है, तो इस बात को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए. लड़कियां मुझसे कहती हैं, “अनुजा, मैं अपने पिता से प्यार करती हूं. मैं बस यही चाहती हूं कि ऐसा बर्ताव बंद हो.” (सीएसजे रिपोर्ट)

रिपोर्ट में आगे यह भी बताया गया है कि हालांकि आपराधिक दोषसिद्धि अपराध या नुकसान की आम स्वीकृति है, लेकिन यह “अपराधी द्वारा माफ़ी मांगने या उनके (सर्वाइवर के) नज़दीकी लोगों द्वारा उनपर विश्वास किए जाने के समान भावना” नहीं जगा सकती है. जैसा कि कनाडाई मूलनिवासी समुदाय – हॉलो वॉटर के लोग, जो 1980 के दशक से पुनर्स्थापनात्मक प्रथाओं से जुड़े हुए है, कहते हैं, “कैद का मतलब है कि अपराधी अपने द्वारा पैदा किए गए दर्द के लिए अपनी ज़िम्मेदारियों का सामना करने के बजाय छिप सकते हैं.”

2015 में, सुजाता बालिगा ने अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संस्था इम्पैक्ट जस्टिस की शुरुआत की, जो यौन शोषण के मामलों में रेस्टोरेटिव ज़स्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय पर काम करती है. वे कहती हैं:

“रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय के एक मध्यस्थ के रूप में, मेरा काम यह पूछने से शुरू होता है कि सर्वाइवर उस व्यक्ति से मिलकर क्या चाहते हैं जिसने उन्हें नुकसान पहुंचाया है. हालांकि उनके जवाब अलग-अलग होते हैं, यौन हिंसा के मामलों में एक समान बात होती है – वे उस व्यक्ति से जिसने उन पर हमला किया था यह सुनना चाहते हैं, “तुम सच कह रहे हो. मैंने तुम्हारे साथ ऐसा किया. यह मेरी गलती है, तुम्हारी नहीं.” वे अक्सर चाहते हैं कि यह स्वीकृति दोनों के परिवारों और दोस्तों की उपस्थिति में हो. ज़्यादातर सर्वाइवर भी इसी की तलाश में होते हैं कि जिस व्यक्ति ने उन्हें नुकसान पहुंचाया है वह वास्तव में समझता है कि उसने क्या किया है और वह ऐसा दोबारा नहीं करेगा. कुछ लोग अनुरोध करते हैं कि उस व्यक्ति को दोबारा कभी न देखना पड़े.”

2022 में एक कार्यक्रम में, बालिगा ने अपनी बातचीत में न्याय मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस तथ्य की ओर इशारा किया कि औरतों के खिलाफ़ घरेलू हिंसा के मामलों में, 50 फीसदी सर्वाइवर अदालतों में नहीं जाते हैं, जबकि 20 फीसदी हैं जो आखिरकार कहते हैं कि इस प्रक्रिया ने उन्हें “कम सुरक्षित” महसूस कराया. उन्होंने तर्क दिया कि इसकी एक बड़ी वजह यह है कि न्याय प्रणाली उन 30 फीसदी औरतों की ओर ध्यान दे रही है जो स्थिति से “बाहर निकलना” चाहती हैं और नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति से खुद को दूर रखना चाहती हैं, लेकिन यह उन 70 फीसदी औरतों की ओर नहीं देख रही है, जो या तो साथ रहना चाहती हैं या साथ रहना जिनकी ज़रूरत है.

“जेल की सज़ा का प्रावधान सर्वाइवर द्वारा इन सबसे बाहर निकलने के रास्तों की अहमियत को नज़रअंदाज़ करता है. वैवाहिक बलात्कार या कार्यस्थल पर यौन हमले को अपराध मानने वाले कानून उन औरतों की मदद नहीं करते जिनके पास कहीं और जाने की जगह नहीं है, न ही उनकी मदद करते हैं जिनके पास वहां पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है. (99 फीसदी के लिए नारीवाद)

जबकि दंडात्मक नज़रिया अपराधियों को उनके द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को स्वीकार करने से हतोत्साहित करता है, रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय का नज़रिया इसे प्रोत्साहित करता है.

केवल स्वीकृति के साथ ही बातचीत यह तय करने के लिए आगे बढ़ सकती है कि किस तरह की भरपाई की जानी चाहिए और कैसे.

“लक्ष्मी के पिता को उसके साथ बलात्कार करने के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी, और उसे तीन लाख रुपए का मुआवजा मिला. लेकिन लक्ष्मी की मां ने कभी उसपर यकीन नहीं किया. लक्ष्मी की गवाही के बाद, उसकी मां अदालत में उसके पास गई और अपनी बेटी को यह कहते हुए खुद से अलग कर दिया कि वह उसके लिए मर चुकी है. आपराधिक न्याय प्रणाली ने लक्ष्मी को सबसे बेहतर मदद दी जो कानून दे सकता था, लेकिन मां के साथ लक्ष्मी के संबंध ठीक नहीं हो सके. हालांकि लक्ष्मी अपने पिता को सज़ा दिलाकर खुश थी, लेकिन कुल मिलाकर वह दुखी थी. उसने अपने माता-पिता, दोनों के साथ संबंध खो दिए थे. (सीएसजे रिपोर्ट)

जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरण में दिखाया गया है, हमें अक्सर पीड़ित और अपराधी की परंपरागत सोच को तोड़ने और इसमें शामिल अन्य लोगों को भी देखना चाहिए. हो सकता है कि अपराधी अपनी ज़िंदगी में खुद किसी वक्त में ऐसे किसी बुरे बर्ताव का शिकार हुआ हो, इसके लिए रेस्टोरेटिव ज़स्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय की प्रक्रिया की ज़रूरत होती है ताकि उन्हें उनके द्वारा अनुभव किए गए नुकसान का समाधान करने में मदद मिल सके और साथ ही उनके द्वारा किए गए नुकसान की ज़िम्मेदारी भी ली जा सके. बालिगा रेस्टोरेटिव जस्टिस को अपनाने वालों को प्रशिक्षित करती हैं और 2018 में, उन्होंने स्वागत राहा और अरेलीन मनोहरन को प्रशिक्षित किया, जो अब एनफोल्ड संस्था में रेस्टोरेटिव प्रैक्टिस टीम का हिस्सा हैं. बाल यौनिक हिंसा के मामलों में रेस्टोरेटिव ज़स्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय के दृष्टिकोण को अपनाने के अलावा, एनफोल्ड की टीम कानूनी संघर्ष करने वाले बच्चों, यानी किशोर न्याय के क्षेत्र में भी काम करती है.

फोटो साभार : एनफोल्ड इंडिया के फेसबुक पेज से

बच्चों के लिए और उनके बीच रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय

भारत में कानून के अन्य क्षेत्रों की तुलना में किशोर न्याय का रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय के मूल्यों से बहुत पुराना परिचय है. इस विषय पर स्वागता ने अपने शोध लेख में भी लिखा है. 1919-20 के दौरान की भारतीय जेल समिति रिपोर्ट ने किशोर न्याय कानून में बच्चों के बीच अपराध की स्थितियों के पैदा होने में “प्रतिकूल वातावरण” की भूमिका को मान्यता दी है. नतीजन पुनर्निर्माण को लेकर उनके विचार ज़्यादा खुले थे.

1986, 2000 और 2015 के जेजे अधिनियमों जैसे बाद के कानूनों में इसकी झलक मिलती है. जेजे अधिनियम में इस सिद्धांत का पालन किया गया है कि कैद में रखने का इस्तेमाल केवल अंतिम उपाय के रूप में किया जाना चाहिए. इसमें मामलों को कोर्ट-कचहरी से मोड़कर इसका समावेशीकरण किया जाए. समावेशीकरण से मतलब यह था कि ऐसे मामलों को सामाजिक कार्यकर्ताओं या तीसरे पक्ष एनजीओ से जोड़ दिया जाए या आरोपी बच्चों को समाज में शामिल करने के प्रयास किए जाएं. रिपोर्ट कहती है कि इन अधिनियमों का लागू न होना लगातार एक मुद्दा रहा है. 2009 में अदालतों ने इसे मानते हुए, एक कार्यकारी स्तर पर संबंधित विभागों की निगरानी के लिए एक समिति का गठन किया था.

न्यायमूर्ति मदन लोकुर और उस वक्त के अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने ज़मीनी स्तर पर स्थिति को समझने के लिए कई बाल सुधार केंद्रों का दौरा किया. जिसके चलते इस मामले पर नियमित क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के गोलमेज़ सम्मेलन हुए. स्वागता के साथ तकनीकी विशेषज्ञ के तौर पर लाए गए एरेलीन बताते हैं कि इस साल 9वें ऐसे गोलमेज़ सम्मेलन का विषय रोकथाम, पुनर्स्थापनात्मक न्याय, मोड़ और विकल्प है. वह कहती हैं, “निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह थोड़ा जल्दी है,” लेकिन यह हैरतंगेज बातचीत को गति दे रहा है.

“आप सीधे रेस्टोरेटिव जस्टिस में नहीं कूद सकते”, स्वागता कहती हैं, यह समझाते हुए कि हालांकि उन्होंने शुरू में इसे “जादूई गोली” के रूप में देखा और इसे कानून में शामिल करवाने के लिए उत्साहित हो गईं. लेकिन अब उन्हें समाधान की वकालत करने से पहले इसके मूल्यों को बेहतर ढंग से समझने और अपने कौशल में सुधार करने की ज़रूरत महसूस होती है. “यहां ढांचागत नुकसान बहुत ज़्यादा है, लोग दमनकारी व्यवस्था में रह रहे हैं. आपको उन्हें रोजमर्राह के आधार पर असल वजूद से जुड़े मुद्दों से निपटने के साजो-सामान और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ना होगा. यह कहना काफी नहीं है कि आओ, एक गोला बनाओ और जीवन खुशहाल हो जाएगा”, वे कहती हैं. उदाहरण के लिए, कोविड-19 महामारी के दौरान, एनफ़ोल्ड की पुनर्स्थापना टीम को राशन और दूसरी तत्काल ज़रूरत की चीज़ें मुहैय्या कराने के लिए मंडलियों के संचालन से हटकर काम करना पड़ा. जैसा कि बालिगा ने कहा, “रेस्टोरेटिव जस्टिस/ पुनर्स्थापनात्मक न्याय को लागू करने के लिए यह ज़रूरी है कि बार-बार इस तरह के सवालों पर लौटा जाए कि “क्या ज़रूरी है और यह किसकी ज़िम्मेदारी है?” एक अर्थ में, रेस्टोरेटिव/ पुनर्स्थापनात्मक प्रक्रियाओं को स्वाभाविक रूप से ढांचागत बदलाव की ज़रूरत को पहचानना होगा. स्वागता कहती हैं, सोच का यह दायरा होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि ये दायरा लोगों को यह याद दिलाने में मदद करता है कि रेस्टोरेटिव जस्टिस क्या है और क्या नहीं.

उदाहरण के लिए, रेस्टोरेटिव/ पुनर्स्थापनात्मकता को ‘मध्यस्थता’ मानना एक आम गलतफ़हमी है. मध्यस्थता का इस्तेमाल अक्सर उन मामलों में किया जाता है जहां दोनों पक्षों ने नुकसान में योगदान दिया है और वित्तीय लेन-देन के ज़रिए हल निकालने पर ध्यान देते हैं, जबकि रेस्टोरेटिव जस्टिस का इस्तेमाल अक्सर आपराधिक मामलों में पीड़ित और अपराधी के बीच स्पष्ट अंतर के साथ किया जाता है. और इसमें सामूहिक ज़िम्मेदारी, स्वीकृति, नुकसान और पीड़ित की ज़रूरतों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. दोनों प्रक्रियाओं में समुदाय की भूमिका भी अलग-अलग समझी जाती है. जबकि मध्यस्थता मे केवल उन लोगों को शामिल किया जाता है जो सीधे तौर किसी एक पक्ष से जुड़े हों. इसमें ऐसे वकील शामिल होते हैं जो अपने ग्राहक के हितों की रक्षा करते हैं और अपराध स्वीकार करने को हतोत्साहित करते हैं, दूसरी तरफ रेस्टोरेटिव में वे समुदाय भी शामिल होते हैं जिनपर इस अपराध का असर हुआ हो और जिन्हें शायद दोनों पक्षों में से कोई भी नहीं जानता हो. रेस्टोरेटिव जस्टिस की प्रक्रिया में जो लोग शामिल होते हैं वे तटस्थता के साथ ऐसा माहौली बनाने की कोशिश करते हैं जिसका मकसद नुकसान को पहचानना और उसकी मंज़ूरी को बढ़ावा देना होता है. इस तरह इन दोनों के बीच घालमेल करना बहुत भ्रामक हो सकता है क्योंकि ये रेस्टोरेटिव के बुनियादी मूल्यों से अलग हो जाता है.

हालांकि, स्वागता अपनी बात रखते हुए आगे कहती हैं कि हम सैद्धांतिक ढांचों में बंधकर अपना काम नहीं कर सकते हैं. वह मध्य प्रदेश में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि उन्होंने ज़मानत के लिए पेड़ लगाना एक शर्त बना दिया था. “हम इसे रेस्टोरेटिव जस्टिस के रूप में नहीं देख सकते हैं, लेकिन बंजर भूमि अब हरी है और वह दोषी में समुदाय के प्रति मूल्य की भावना बढ़ा रही है.” लोगों को उनके द्वारा पहुंचाए गए नुकसान के सीमित दायरे से आगे बढ़कर व्यापक रूप में देखना ही रेस्टोरेटिव के दर्शन और समाज में अपराध के लिए सामूहिक ज़िम्मेदारी लेने की परिवर्तनकारी प्रक्रिया की बुनियाद है.

इस लेख का अनुवाद पारिजात नौटियाल ने किया है.

शालोम गौरी, एक लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनकी रुचि राजनीतिक अर्थव्यवस्था और न्याय के प्रश्नों में है. वे वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई कर रही हैं.

कुशल चौधरी एक स्वतंत्र पत्रकार और शोधकर्ता हैं. उन्होंने बहुत सारे विषयों पर काम किया है जिसमें विशेषकर भारत में जाति, धर्म, कृषि और आदिवासी समुदायों से जुड़े विषय शामिल हैं.

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