कुन्तला

अपराध संस्करण विशेष - हिंदी कहानी शृंखला

चित्रांकन: सुतनू पाणिग्रही

जब हमने नारीवादी नज़रिए से अपराध को देखने के बारे मे सोचा तो पहला सवाल यही था कि आखिर इसका मतलब क्या है? अपराध से हम क्या समझते हैं? हमारी मौजूदा आपराधिक न्याय प्रणालियां – कानून, अदालतें और संस्थाएं – जो अपराध और न्याय की प्रक्रिया को परिभाषित करती हैं उनकी सीमाएं क्या हैं? क्या अपराध को देखने की अन्य कल्पनाएं भी हो सकती हैं? और किस तरह के विरोधाभास हमें दिखाई देते हैं, जब हम महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की जाति, उम्र, या धर्म के आधार पड़ताल करते हैं? ‘अपराध’ को देखने का नारीवादी नज़रिया हमें संरचानाओं और उनके मापदंडों पर सवाल करने की अनुमति देता है.

इस संस्करण में हम हिंदी की मूल कहानियों के ज़रिए भी अवधारणाओं पर बात करने की कोशिश कर रहे हैं. इस कड़ी में पेश है पहली कहानी – कुन्तला. इस कहानी की लेखक हैं सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक सीमा आज़ाद और यह उनकी किताब ‘औरत का सफर: जेल से जेल तक’ से ली गई है. एक आम महिला कैदी के जीवन के बारे में हम क्या जानते हैं? उनके द्वारा किए अपराध की जड़ में क्या छिपा होता है? उस महिला कैदी के डर, सपने और चाहतें क्या हैं? उसके लिए जेल के बाद की दुनिया कैसी होती है?

सीमा आज़ाद ने दो साल तक इलाहाबाद की नैनी जेल में रहते हुए जेल में बंद औरतों की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक परिस्थितियों को बहुत करीब से देखा और कुछ हद तक उसे जिया भी है. जेल के भीतर कितनी ही अनसुनी कहानियां हैं जो उसकी चारदीवारी के भीतर ही टकरा कर रह जाती हैं. ऐसी ही एक अनसुनी आवाज़ कुन्तला की भी है जो एक समय में उत्तर-प्रदेश की नैनी जेल में उस अपराध के लिए सज़ा भुगत रही थी जिसके बारे में उसे पता ही नहीं था कि यह अपराध उसने कब किया, कैसे किया और क्या यह अपराध भी है! कुन्तला की कहानी इस तथ्य को उजागर करती है कि हमारी न्याय-व्यवस्था का चेहरा पुरुष प्रधान है. घर से लेकर जेल. जेल से लेकर घर तक. एक निरंतरता है जिसमें औरत झूलती रहती है. दोनों ही जगहें एक जैसी हैं, जहां हर कदम पर पितृसत्ता की जड़ें घनघोर मज़बूत होती दिखाई देती हैं. पर वो कहते हैं न, औरत ही औरत की दोस्त होती है. तो कुन्तला की उम्मीद भी वहीं से निकलकर आती है. कैसे? जानने के लिए पढ़िए यह कहानी.

कुन्तला की इस कहानी को लेखक एवं शोधकर्ता रिम्पल मेहता और महुआ बंदोपाध्याय की हाल ही में प्रकाशित किताब ‘विमेन इनकार्सरेटेड: नैरेटिवस फ्रॉम इंडिया’ (जेल में बंद महिलाएं: भारतीय आख्यान) पर द थर्ड आई टीम के साथ उनकी बातचीत के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है.

कुन्तला इलाहाबाद के कौशाम्बी की रहने वाली थी. पास के ही गांव में शादी हुई थी. थोड़ी सी ज़मीन थी और पति की मज़दूरी. इसी से सात जनों का घर चल रहा था. पति-पत्नी चार बच्चे और बच्चों की दादी. सबसे बड़ा बेटा भी मज़दूरी के काम में हाथ बंटाने लायक हो गया था, जबकि सबसे छोटी बेटी अभी तीन साल की ही थी.

कुन्तला का पति नशाखोरी के चंगुल में आ गया था और उसे अब मेहनत-मजूरी अच्छी नहीं लगती थी. पहले मेहनत के बाद की थकान दूर करने के लिए नशा करता था, बाद में नशा खरीदने के लिए कभी-कभार मेहनत करने लगा. घर के लोग उससे परेशान हो गए थे. घर के लिए वह नाकारा साबित होता जा रहा था, भले ही कहने को वह घर का मुखिया था. उसका नशा भी जारी रहे और घर भी चलता रहे, इसके लिए वो नशे के कारोबार में ही शामिल हो गया और इसी अपराध में एक दिन जेल पहुंच गया.

उसके, यानी घर के मुखिया के जेल जाने से घर में कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा. पहले ही कुन्तला अपने बड़े बेटे, जो कि 13-14 साल का था, की मदद से घर चला रही थी. भले ही भारत के कानून के हिसाब से इतने बड़े बच्चे का मज़दूरी करना गैरकानूनी है, पर यह तो किताबों में लिखा है, जिसे लोग पढ़ने के लिए और कोर्ट में जज को बताने के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसके बाहर की दुनिया अलग है, जहां लोग अपनी ज़रूरत के हिसाब से काम करते हैं, कानून की हिदायत से नहीं क्योंकि कानून उनकी ज़रूरतों पर कोई ध्यान नहीं देता, इसलिए वे भी कानून पर कोई ध्यान नहीं देते. दूसरी ओर इन बच्चों से काम लेने वाले लोग अपनी पहुंच और जोड़-तोड़ से इन कानूनों की काट निकाल लेते हैं और सब कुछ यथावत चलता रहता है. ऐसे ही सिस्टम में कुन्तला और उसका बड़ा बेटा दोनों ही घर चलाने के लिए मज़दूरी करते थे. घर पर सास छोटे बच्चों को देख लेती थीं. यानी घर के ‘मुखिया’ के बगैर भी घर पूर्ववत चल रहा था, बल्कि आए दिन होने वाली गाली- गलौच, मार-पीट बंद थी और घर सुकून में था.

एक दिन कुन्तला के पति की जेल में तबीयत काफी खराब हो गई. उसे जेल के बाहर के अस्पताल में भरती कराया गया और कुन्तला के पास खबर भेज दी गई कि वह अस्पताल में पति की सेवा के लिए आ जाए. वह किसी काम का नहीं था लेकिन पति था, इसलिए हर हाल में जाना ही था, भले ही उसके जाने से घर पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़े.

अपनी तीन साल की छोटी बेटी को साथ लेकर, पूरा घर सास के भरोसे छोड़कर कुन्तला अस्पताल में आ गई. दो दिन भी नहीं बीते थे कि पति की हालत में सुधार होने लगा था. सुबह जब डॉक्टर राउंड पर आया, तो उसने बता दिया कि अगले रोज़ अस्पताल से उसकी छुट्टी हो सकती है. उसी दिन शाम को कुन्तला का पति बाथरूम के लिए गया और वापस बिस्तर पर नहीं आया. काफी देर तक जब वह नहीं आया, तो कुन्तला को लगा कि वह कहीं बाथरूम में गिर तो नहीं गया? यह देखने के लिए वह बाथरूम में गई और वहां उसे न पाकर उसने ही ड्यूटी पर तैनात सिपाही को बताया कि उसका पति तो वहां नहीं है. सिपाही के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. उसने तत्काल इधर-उधर ढूंढा, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला. सिपाही की तो नौकरी पर खतरा आ गया. उसे कुछ नहीं सूझा, तो उसने कुन्तला के खिलाफ ही एफआईआर लिखा दी कि उसने ही अपने पति को भगाया है. और पति की जगह कुन्तला अपनी तीन साल की बेटी के साथ जेल में डाल दी गई.

जेल में भी बड़े-बड़े अधिकारियों ने आकर उसे धमकाया कि वो मान ले कि उसने ही पति को भगाया है, लेकिन कुन्तला नहीं झुकी, वो यही कहती रही कि इस बारे में उसे कुछ नहीं मालूम और उसे कोई अंदाज़ा नहीं कि वो भागकर कहां गया होगा. लेकिन कुन्तला के इस सच पर किसी को यकीन ही नहीं था कि उसके पति ने तो पुलिसवालों से ज़्यादा खुद उसे ही धोखा दिया है. जिसके कारण वह तीन साल की बिटिया के साथ बिना किसी अपराध के जेल भेज दी गई.

उसके पति ने भी सरेंडर नहीं किया, जबकि कुन्तला हर रोज़ इसी उम्मीद में रहती कि शायद आज उसका पति सरेंडर कर दे, तो वो अपनी बेटी को लेकर घर जाए, जल्दी में घर सास के भरोसे छोड़कर अस्पताल में आ गई थी, उसके छोटे बच्चे घर पर उसका इंतज़ार कर रहे होंगे. घर की स्थिति की कल्पना कर वह रोती रहती और पति को कोसती रहती – ‘अपना जनम भी बिगाड़ा, हम सब का भी.’ उसका कोसना शायद असर कर गया. लगभग 15 दिन बाद उसका पति अपने एक रिश्तेदार के यहां से गिरफ्तार कर लिया गया. कुन्तला को लगा कि पति पकड़ लिया गया है तो अब उसे छोड़ दिया जाएगा, लेकिन यह उसका भोलापन था. उस पर तो मुकदमा दर्ज हो चुका था, जिसे अदालती प्रक्रिया से गुज़रना ही था. कुन्तला यह जानकर बहुत निराश हुई. इस बारे में मुझसे और जेल की पुलिसाइनों से पूछती रहती कि जब उसका पति मिल गया है, तो उसे जेल से बाहर क्यों नहीं कर रहे हैं? पुलिसाइनों का जवाब होता – ‘जब भगाई हो तो भुगतो.’ मैंने उसे समझाया, तब जाकर उसने पुलिसाइनों से पूछना बंद किया.

उधर जेल आने के बाद उसका पति शनिवार की हर मुलाकात (जो जेल के अंदर बंद संबंधियों की मुलाकात होती है) में बहाने खोजकर उससे लड़ता था. वह कुछ सनकी भी था. जब कुन्तला ठीक से तैयार हुए बगैर उससे मिलने चली जाती तब वह उससे यह कह कर लड़ता था कि ‘इतना मनहूस की तरह क्यों चली आई हो’ और जब कभी वह ठीक से तैयार होकर मिलने जाती तो कहता कि ‘इतना बन-ठन के किसको दिखाने आई हो.’ अदालत के लॉकअप में भी उसे बिना बात के लड़ता ही रहता था. हर अदालत के बाद उसकी छोटी बेटी रूपा आकर बताती, ‘मोल पापा ललाई कलत लहे, मोल मम्मी लोवत लही’ (मेरे पापा लड़ाई कर रहे थे, मेरी मम्मी रो रही थी) एक बार इस झगड़े से चिढ़कर कुन्तला लगातार दो शनिवार उससे मिलने ही नहीं गई. इस पर भी उसे चैन नहीं मिला. तीसरे शनिवार आने के पहले पुरुष जेल से खबर आई कि उसके पति ने पत्नी के वियोग में बाल रंगने वाली डाई पीकर आत्महत्या करने की कोशिश की. इस बात में पता नहीं कितनी सच्चाई थी, लेकिन यही कह कर जेल की सिपाही उसे अगले शनिवार की मुलाकात में जबरन ले गई. उस शनिवार औरतें यही चर्चा करती रहीं कि ‘कुन्तला का आदमी अपनी पत्नी को कितना चाहता है.’ कुन्तला से जब किसी ने यह कहकर टहोका लिया, तो उसने कहा – ‘डाई पीके मरु ग होत तो ठीक रहा, मुक्ति तो मिलत ऐसे.’ (मर गया होता तो ही ठीक था, कम से कम मुक्ति तो मिल गई होती.)

जेल में बेटी रूपा के लिए मिलने वाले दूध को बेचकर कुन्तला रूपा के लिए बिस्कुट खरीदती और कुछ पैसे जोड़कर घर पर भेज देती थी. उसे हर समय घर पर छोड़ आए बच्चों की चिंता लगी रहती थी. नौ महीने जेल में रहने के बाद कुन्तला की ज़मानत हो गई. उसकी सास ने उसकी ज़मानत कराई.

एक दिन अदालत से लौटने के बाद रूपा ने दौड़कर हमें बताया, ‘ए छीमा दीदी! काल मोल लिहाई आई’ (ए सीमा दीदी! कल मेरी रिहाई होगी) और अगले दिन सुबह कुन्तला उछलती-कूदती रूपा को साथ लिए जेल के बाहर निकल गई.

इस जेल से उस जेल तक. औरतों की जेल का विस्तार कितना बड़ा है.

सीमा आज़ाद एक लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वर्तमान में वे इलाहाबाद में रहती हैं.

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