“गांव में लोग रात में मछली पकड़ते हैं और शहरों में अपना काम पूरा करके सो जाते हैं”

लेख के इस दूसरे भाग में खूंटी, झारखंड की रहने वाली मिलानी एकल महिला के रूप में अपने शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच के फर्क को हमारे सामने ला रही हैं.

चित्रांकन: संगीता जोगी और आरती अहिरवार

द थर्ड आई सिटी संस्करण के ‘ट्रैवल लोग’ प्रोग्राम का हिस्सा मिलानी संघा के लेख का यह दूसरा हिस्सा है. इस प्रस्तुति को भारत के तीन अलग-अलग राज्यों से आनेवाली, और एक-दूसरे से बिलकुल अनजान महिलाओं ने मिलकर तैयार किया है.

शहर को देखने की हमारी इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा हमारे 13 ट्रैवल लोग हैं जिनके ज़रिए हम भारत के अलग-अलग कोने से शहरों, कस्बों और गांवों के उनके अनुभवों एवं नज़रियों को जानने और समझने की कोशिश कर रहे हैं.

मिलानी के शब्दों को चित्रों में ढालने का काम संगीता जोगी ने किया है. संगीता, एक कलाकार हैं. वे मज़दूरी करती हैं और अपने तीन बच्चों एवं परिवार के साथ राजस्थान के सिरोही ज़िले में रहती हैं. हाल ही में तारा बुक्स से प्रकाशित उनकी चित्रात्मक किताब ‘द विमेन आई कुड बी’ पढ़ी-लिखी आज़ाद ख्याल महिलाओं की कहानी चित्रों के ज़रिए उकेरती है.

संगीता, द्वारा बनाए गए चित्र राजस्थान से चलकर उत्तर-प्रदेश के ललितपुर ज़िले में रहने वाली 21 वर्षीय आरती अहिरवार के पास पहुंचते हैं, जहां वे अपनी कल्पना से इन चित्रों में रंग भरने का काम करती हैं. आरती, वर्तमान में द थर्ड आई के लिए डिजिटल एजुकेटर्स प्रोग्राम से जुड़ी हुई हैं, जहां उन्हें अपनी कला के ज़रिए कहानियां कहने की ट्रेनिंग दी जा रही है. वे पुलिस बल में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं.

(पहला भाग यहां पढ़ें.)

मेरा गांव कोंकेया, झारखंड के खूंटी ज़िले में आता है. मुझे वहां के पर्व-त्यौहारों में सभी के साथ मिलकर नाचना-गाना, एक-दूसरे के घर जाना, मिठाई खाना, वहां की चहल-पहल अच्छी लगती है. खासकर जब ढोल, नगाड़े, मादर बजते हैं और लोग साथ में गाने हैं, मुझे बड़ी खुशी होती है.

कोई रिकॉर्ड वाला गाना नहीं, अपने मुंह से अपनी आवाज़ में गाते हैं, नाचते हैं, थिरकते हैं. महिला-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सब एक साथ बड़ी संख्या में अखाड़े में नाचते हैं.

हमारे गांव में बहुत सारे पर्व हैं, जैसे – सरहुल, करमा, जिरूतिया, क्रिसमस – विशेषकर झारखंड के आदिवासी समुदाय इन पर्वों से जुड़े हैं. पर्व के दिन सजना-संवरना, लड़के-लड़कियों का एक-दूसरे को खूब निहारना, ये सारी चीज़ें मेरे लिए यादगार हैं. यहां पर्व में लोग खूब शराब पीते हैं, ज्यादातर पुरुष. महिलाएं भी शराब पीती हैं, बाजार में महिला-पुरुष एक साथ बैठकर शराब पीते हैं. कई महिलाएं तो इतना पीती हैं कि लोग कहते हैं, “अरे! देखो फलाना की मां कितना पी गई!”. जब लोग ऐसा बोलते हैं, तो मैं शहरों के बारे में सोचती हूं, ‘वहां लोग शराब पीते हैं, कोई कुछ नहीं कहता, सभी अपने में मस्त’. जब मैं घर में रहती हूं तो शराब नहीं पी पाती, चूंकि लोग न जाने मेरे बारे में क्या सोचेंगे. यदि मैं साड़ी के स्थान पर जीन्स पहन लेती हूं तो लोग मुझे कुछ अलग नज़र से देखने लगते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं, ‘देखो! अब साड़ी से शलवार-सूट, जींस-फ्रॉर्क में उतर आई है’ गांव में अपने समाज के कायदे कानून में रहना पड़ता है. कितनी पाबंदियां होती हैं. किस-किस की क्या-क्या बातें सुनने को मिलती हैं. यहां आदमी सूट-बूट पहन ले, लेकिन एक औरत को हमेशा साड़ी के पल्लू से सिर ढककर रहना होगा. इसी जगह आप आदमी को धोती-कुर्ता पहनने को बोलो तो वो नहीं पहनेगा. मुझे गुस्सा आता है. नियम कानून क्या सिर्फ औरतों के लिए होते हैं?

जब मैं गांव से शहर जाती हूं तो कभी जींस पहन ली, कभी फ्रॉक. जूता-मोज़ा, पैंट-सूट पहनकर सैर करने निकल गई. शहरों में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, यहां सभी चीज़ें आराम से और आज़ादी से पहन सकते हैं. जैसे मर्ज़ी खुले बाल घूमो, या बाल छोटे काट लो. बिना परदे के घूमो. किसी को कोई मतलब नहीं. घूमने की आज़ादी, बात करने की आज़ादी – मैं गांव में कम महसूस करती हूं, यहां आप देर तक कहीं घूम नहीं सकते हैं. हां, किसी भी त्यौहार में मुझे अपना गांव ही अच्छा लगता है. लेकिन फिर अगर लोग पीकर लड़ाई-झगड़े करते हैं, तो लगता है कि इससे बेहतर तो शहर ही है.

***
दिल्ली में रहते हुए और दूसरों के घर काम करते हुए, मुझे कई चीज़ों का सामना करना पड़ा. छोटी-छोटी चीज़ों से पता चलता है कि बड़े लोग अपने घरों में काम करने वालों को किस नज़रिए से देखते हैं.

जब हम इनके घरों में काम करते हैं तो इन्हें हमसे इतनी दिक्कत नहीं होती. लेकिन घर के बाहर, जैसे पार्क में, या लिफ़्ट में आते-जाते, इनका रवैय्या बदल जाता है. इन्हें फर्क दिखाई देने लगते हैं.

जिन दीदी के घर मैं काम करती थी, उनकी बेटी को शाम के वक़्त खेलने के लिए पार्क ले जाया करती थी. अपनी बेटी को भी साथ ले चलती थी. मेरे जैसी कई लड़कियां और महिलाएं अपनी मेमसाहब के बच्चों को पार्क लाती थीं और उस वक़्त हम सब मिलते थे. हमारे बच्चे भी पार्क में मेमसाहब के बच्चों के साथ खेलते थे. कई मैम भी आती थीं अपने बच्चों के साथ. एक दिन की बात है, मेरी बेटी हमारी दीदी की बेटी के लिए झूला पकड़ने चली गई. झूले के पास दो मैम बैठी हुई थीं और देख रही थीं. कुछ देर बाद बच्चे झूलने लगे. चूंकि दीदी की बेटी भी साथ थी इसलिए मैम जल्द ही कुछ बोल नहीं पा रहीं थीं.

लेकिन एक मैम आकर बोली, “अरे! ये किसकी बेटी है?”. मैंने कहा, “ये मेरी बेटी है”. तो कहने लगी, ‘नहीं, पहले मेमसाहब के बच्चे झूलेंगे, इसको साइड करो, मेड के बच्चों के लिए झूला नहीं है”. मैंने पलट कर जवाब दिया तो कहा-सुनी होने लगी. इतने में मेरी एक सहेली ने आकर पूछा, “क्या हुआ?”. मैंने बताया, “ये मैम कह रही है मेड के बच्चे पार्क में नहीं झूल सकते”. सहेली ने मेरा साथ देते हुए कहा, “मैडम काटने से हमारा खून भी लाल ही है! घर का सारा काम हम लोग करते हैं. उस वक़्त आप लोग इन बातों को नहीं देखते. तब कोई छुआछूत नहीं होती? पार्क में हमारे बच्चे झूल रहे हैं तो ऊंच-नीच कर रहे हैं”. तब तक वहां गार्ड भी आ गया, बोला क्या हो रहा है? हमने कहा, “अरे भैया! हमारे बच्चे यहां पार्क में झूल रहे हैं तो कुछ मेमसाहब लोगों को अच्छा नहीं लग रहा”. लेकिन गार्ड भी बोला, “मेम साहब के बच्चों को झूलने दो”. हमने गार्ड को भी सुना दिया, “अरे! हम इनके घरों में काम करते हैं, हमारे बच्चे हैं तो वो भी इनके बच्चों के साथ ही खेलेगें न”. एक लड़की ने मेम से कहा,

“मैडम ऐसा है तो आप अपने घर में किसी मेड को मत रखिए, ख़ुद अपना काम कीजिए, वरना कहीं ऐसा न हो कि हमारी वजह से आपका खून काला हो जाए!”

जब ये बड़े लोग इस तरह पेश आते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है. कभी-कभी लिफ्ट में भी जब काम करने वाले चढ़ते हैं, तो कई मैम लोग उनके साथ लिफ़्ट में नहीं जातीं. ऐसी कई मैम होती थीं जो मेड के बच्चों को पसंद नहीं करती थीं, लेकिन कई ऐसे भी मिले जो अपने बच्चों के जन्मदिन पर मेरी बेटी को भी बुलाते थे और रिर्टन गिफ्ट भी देते थे. कुछ मेम लोग मेरी बेटी को कपड़े भी देती थीं. मेरी बेटी बहुत खुश होती थी. कहते हैं न पांचो उंगलियां बराबर नहीं होतीं, इसी तरह दुनिया के सभी धनी या गरीब एक जैसे नहीं होते. लेकिन एक बात तो सच है कि बिना नौकर या नौकरानी के बड़े लोगों का काम नहीं होता है.

***

अपने दोस्त अलविनुष से मैं पहली बार 1993 में मिली जब मैं गांव से 11वीं की पढ़ाई के लिए खूंटी आई. मैट्रिक तक की पढ़ाई मैंने गांव में ही पूरी की थी, फिर खूंटी आई, जहां मैं एक किराए के मकान में रहने लगी. पढ़ाई के साथ-साथ मैं हॉकी में भी बहुत आगे थी. बहुत मेडल भी जीते, लेकिन आगे चलकर हॉकी खेलना मेरी नसीब में नहीं था. ख़ैर, मैं जिस मौहल्ले में थी उसी मौहल्ले में अलविनुष भी रहता था. उसको मैं पहले से ही जानती थी, लेकन खूंटी आकर धीरे-धीरे हमारे बीच नजदीकियां बढ़ीं. हम दोनों एक-दूसरे को ‘किस-मी’ टॉफी देकर प्यार का इज़हार किया करते थे.

एक दिन मैं खेलने जा रही थी तो वो रास्ते में मिला, कैसी हो? वगैरह-वैगरह पूछा, फिर उसने मुझे कहा, “बहुत सुंदर हो, इस ड्रेस में अच्छी लग रही हो.” मैंने एक छोटी सी स्कर्ट, जूता, मोज़ा, टीशर्ट पहन रखा था, एक हाथ में बैग और दूसरे में हॉकी स्टिक. मैं बोली, “देर हो रही है जाने दो.” वो बोला, “चलो न, साथ-साथ चलते हैं.” मैं शर्म से कुछ बोल ही नहीं पा रही थी. साथ-साथ हम ग्राउंड में पहुंचे. मैं अंदर चली गई. लेकिन उसकी बातों को याद करके मैं अंदर ही अंदर खुश हो रही थी, सोच रही थी, ‘मैं सुंदर हूं, कोई मुझे पसंद करता है’. हम दोनों की मुलाकातों का सिलसिला यूंही चलता रहा.

अलविनुष कभी मेरे मकान मालिक की बेटी को देखने के बहाने आ जाता, तो कभी टी.वी. देखने के बहाने. वह मुझे देखने के लिए कोई न कोई उपाय ढूंढता रहता था. मैं भी कम नहीं थी. एक दिन रूमाल बना रही थी, वो एक और लड़के के साथ आया, और दोनों हमारे कमरे के बाहर बैठ गए. फिर बोले, “अरे! रूमाल भी बना लेती हो? हमें भी दो न.” मैंने दो रूमाल उन्हें दे दिए. रूमाल को देखकर अलविनुष बोला, “अरे इसमें तो कुछ नहीं लिखा है, न कोई फूल बना है.” तो कुछ दिन बाद, मैंने अलविनुष को फूल वाली एक रूमाल दी और अलविनुष ने मुझे एक टॉफी लाकर दी जिसमें एक कागज़ छिपा हुआ था. मैंने जैसे ही टॉफी को खोला तो देखा कागज़ पर कुछ लिखा हुआ है. लिखा था – ‘मेरा पहला प्यार तुम हो, मैं तुम्हें पसंद करता हूं. तुम हंसती हो तो डिपंल पड़ते हैं. तुम कितनी सुंदर हो.’ ‘आई लव यू’ भी लिखा था. मुझे शर्म आई, मैं मन ही मन खुश हो रही थी. फिर क्या था धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं. मैं भी दिन में उसको देखना चाहती थी. उसका घर मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था. उसके घर से मैं दिख जाती थी. इस तरह धीरे-धीरे हमारी नज़दीकियां बढ़ने लगीं. मैं उसके घर जाती थी और वो मेरे घर आता था. मैं साथ भी रहती थी. कभी मिलने का मन हो तो मैं बस लैटर भेज देती थी और कोई उसको दे देता था.

जब इंटर की पढ़ाई पूरी हुई तो मैं वापस अपने गांव चली गई. इस बीच मेरे लिए एक रिश्ता आया. मेरे जीजा लाए थे यह रिश्ता. मैंने उससे इंकार कर दिया. अलविनुष की वजह से. मैं उसे छोड़ नहीं पा रही थी.

मुझे इससे पहले कभी किसी ने ‘आई लव यू’ नहीं कहा था, पहला प्यार था, मुझे लग रहा था कि दुनिया में इसके अलावा मेरे लिए और कोई लड़का नहीं हो सकता.

जीजा जिस लड़के का रिश्ता लाए थे वो सी.सी.एल. में काम करता था. जब मैंने रिश्ता ठुकराया तो वह बहुत नाराज़ हुए, बोले, “ठहरो, तुम एक दिन बहुत पछताओगी, बिना नौकरी के लड़के से शादी कर रही हो, कैसे पालेगा तुमको?” जब मैंने ये सारी बातें अलविनुष को बताईं, तो वह बोला, “तुम मुझको छोड़ नहीं सकती हो.” ऐसा करते-करते हम दोनों ने एक दूसरे को 10 साल तक का समय दिया. इस बीच मैं दिल्ली जाकर काम करने लगी, कमाने लगी. आख़िरकार हमने सोचा कि अब हमें शादी कर लेनी चाहिए.

शादी से पहले हमारी कुछ रस्में होती हैं. सगाई में हमारी पसंद-नापसंद पूछी जाती है. लड़के और लड़की को कांसे के बर्तन के साथ कांसे का लोटा पकड़ने के लिए देते हैं. लोटा रूमाल से ढका होता है, और उसके अंदर चाय होती है. दोनों को लोगों के सामने एक नई चटाई के ऊपर खड़ा करते हैं, लड़की के साथ एक गवाह और लड़के के साथ एक गवाह भी होते हैं. फिर दोनों से पूछा जाता है कि नाम क्या है? गोत्र क्या है? क्या दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं? पहले लड़की से कहते हैं कि यदि तुम्हें लड़का पसंद है तो तीन कदम आगे बढ़कर लड़के को थाली दो. फिर लड़की तीन कदम बढ़कर थाली देती है. फिर तीन कदम पीछे लौटती है. फिर लड़का भी ऐसा ही करता है. ये तीन बार होता है. शादी के बाद वचन-दत्त की रस्म होती है और फिर शादी क्लास जो ईसाई धर्म में अनिवार्य है. शादी क्लास के बिना शादी को मान्यता नहीं मिलती. ये सभी रस्में हमने शादी से पूर्व पूरी कीं. दिनांक 16.01.2002 को ईसाई धर्म के रीति रिवाज के अनुसार चर्च में लोगों के सामने हमारी शादी हुई. बहुत संख्या में लोग आए थे और उनके सामने हमने एक दूसरे से वादा किया कि हम दोनों ज़िंदगी भर सुख और दुख में विश्वास के साथ साथी बने रहेंगे. हम दोनों की तरफ़ से गवाहों ने रजिस्टर में हस्ताक्षर भी किए.

इसके बाद मैं जनवरी माह में ही गर्भवती हुई, और 12.10.2002 को मैंने अपनी बेटी को जन्म दिया. सभी बहुत खुश थे. पर सास के मन में उम्मीद थी कि बेटा होगा. लेकिन मेरे पति खुश थे, बोले, “कोई बात नहीं, बेटा हो या बेटी दोनों बराबर हैं.” बेटी के जन्म के बाद, मैं फिर दिल्ली आ गई.

***
दिल्ली में काम करते हुए मैं उन दूसरी लड़कियों की ज़िंदगी और परेशानियों से भी टकराई जो मेरी तरह दूसरों के घरों पर काम करतीं थीं. एक घटना याद आती है – मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया कि डिफेंस कॉलोनी में एक महिला ने, छत्तीसगढ़ से आई एक लड़की को अपने पास रखा हुआ है और वो उससे कुछ गलत काम करवा रही है. उस औरत ने लड़की को काम कराने के बहाने अपने पास बुलाया था.

जो लड़की काम करने आई थी वह नई थी, उसको पता नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला है. वे लोग उसे आज काम मिलेगा, कल काम मिलेगा, ऐसा बोल-बोलकर ठगते रहे.

इसकी जानकारी मैंने ली और दिप्ता दीदी को ये बात बताई. उसके बाद पुलिस बुलाकर हमने उस लड़की को उस महिला के चंगुल से बाहर निकाला.

एक और घटना है, सोमविहार की. वहां एक घर में एक लड़की काम से निकलना चाहती थी लेकिन उसको निकलने नहीं दिया जा रहा था. वो काफ़ी लंबे समय से वहां काम कर रही थी. चूंकि वह एक एजेंसी के द्वारा काम पर लगी थी, वो लोग उसे काम की मज़दूरी भी नहीं देते थे. बिना मज़दूरी के वह दो साल तक काम करती रही. एक दिन वह मुझे पार्क में मिली, बातों बातों में उसने हमें सारी आपबीती बताई. एक दिन वो चर्च आई थी. फिर उसने मुझे अपनी भाषा में, जो हम नागपुरी बोलते थे, बताया कि मेरा एड्रेस ये है. फिर मैंने और मेरी दोस्त सुनाई ने मेरी बेटी कजरी को घुमाने के बहाने उस जगह को ठीक से देख लिया जहां वो लड़की रहती थी. सब कुछ पता करने के बाद, मैंने तुरंत दिप्ता दीदी को सारी बात बताई. फिर दीदी के द्वारा महेश भैया को बताया और हम लोग उसको सोमविहार से निकालकर डिफेंस कॉलोनी ले आए. लेकिन एक दिन उसे क्या मालूम क्या हुआ, वह अपना सामान लेने के लिए सोमविहार चली गई. फिर क्या था? उसकी मेमसाहब ने पुलिस को फोन कर दिया, और पुलिस भी उसे गाड़ी में बिठाकर ले गई. इसकी जानकारी मुझे मिली तो मैंने तुरंत दिप्ता दीदी को बताया और दीदी ने महेश भैया को. भैया ने किसी अखबारवाले या किसी को फोन किया, तब जाकर पुलिस ने उसे छोड़ा. बाद में वह लड़की अपने किन्हीं पहचानवालों के साथ छत्तीसगढ़ चली गई. क्या-क्या होता है इन शहरों में.

एक और घटना. एक छोटी सी बच्ची, 9-10 साल की थी, उसे दो बच्चों की देखभाल के लिए काम पर लगा दिया था. छोटी उम्र में कोई उसे दिल्ली लाया था, और उसकी सारी कमाई के पैसे दूसरे आकर ले जाते थे. एक दिन उसने बताया, “दीदी, मैं गांव जाना चाहती हूं. मुझे निकलने नहीं दिया जा रहा है. जब उसकी मेम बाहर जाती थी तो उसको बाहर से बंद कर देती थी. उस बच्ची से मैंने कहा, “हर दिन तुम दो कपड़े पहनकर आना और मेरे कमरे में कपड़े छोड़ देना. ऐसा करते हुए धीरे-धीरे, वो अपने बहुत सारे कपड़े उस घर से निकालकर ले आई. फिर एक दिन वह ब्रैड खरीदने के बहाने बाहर निकली और वापस नहीं लौटी. गेट पर गार्ड होते थे. मैंने उनसे कहा, “ये लड़की मेरे साथ है.” इस तरह वह वहां से निकलकर चली आई. उसने अपने पहचानवालों को पहले से ख़बर कर दी थी. वे आए और उसे ले गए. इस तरह के कई काम मैंने दिल्ली में किए.

***

आज मेरी ज़िंदगी में कुछ बदल सा गया है. दिल्ली में रहते हुए मैं परिवार से दूर थी. उनके साथ रहने के लिए मैं वापस गांव चली गई, सोचा कि अलविनुष से मेरा बिगड़ता रिश्ता शायद बन जाए. हम दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं, ऐसा हम एक-दूसरे को बोलते रहते थे. लेकिन लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ रहकर भी वो रिश्ता नहीं रहा. मैं कल शांत थी, आज मैं वो नहीं हूं. बिगड़ते रिश्ते को बनाने की कोशिश कई बार की लेकिन नहीं बना. आज हम एक-दूसरे से अलग हैं. यदि एक औरत परिवार से अलग होती है तो उसे बहुत सारी बातें सुनना पड़ती हैं. यदि ऑफिस के स्टाफ़ के साथ, यानी किसी आदमी के साथ, किसी होटल मैं बैठ जाओ तो लोग आपको घूरकर देखेंगे. कहने लगेंगे कि ये देखो फलाने आदमी के साथ चाय पी रही है. किसी पुरुष के साथ ऑफिस के काम से मिलो तो लोग गलत रिश्ता जोड़ देते हैं.

गांव आने के बाद मैं एक जनप्रतिनिधि (पार्षद) बनी. परिवार के साथ-साथ मैं समाज के लिए भी काम करती हूं. 

प्रतिनिधि बनकर अपने को एक पद पर पाती हूं. जीवन मेरा ऐसे बदला है कि आज किसी भी सरकारी दफ्तर में किसी भी अधिकारी से बड़े सहज रूप से मिल पाती हूं. कई चीज़ों में मैं निडर बन गई हूं. लोगों की सेवा करती हूं. मेरी एक पहचान बन गई कि हां, मैडम अच्छा काम करती हैं.

अपने क्षेत्र के लिए क्षेत्र के विकास के लिए कई योजनाएं देती हूं. सड़कों, नालों की सफ़ाई कराना, बिजली-पानी मुहैया कराना, वृद्धा एवं विधवा पेंशन बनाना, राशन कार्ड, गोल्डन कार्ड आदि बनाना – ये सारे काम मैं करती हूं.

काम के दौरान कई प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है. आप जितनी भी कोशिश कर लो, सभी को खुश नहीं किया जा सकता. जब ठण्ड के वक्त कम्बल वितरण होता है, तो वहां भी कई ऐसे व्यक्ति कम्बल लेने आ जाते हैं जिनके पास सबकुछ है. गरीब, असहाय, बूढ़े-बुजुर्गों के लिए कम्बल दिया जाता है लेकिन वहां भी सम्पन्न परिवार वाले आ जाते हैं. अगर हम कम्बल देने से इंकार कर दें तो वे हमें बातें सुनाते हैं कि क्या ये आप अपनी पॉकेट से दे रही हैं वगैरह-वगैरह. वॉर्ड के लोग प्रत्येक पर्व-त्योहारों में पार्षद से आर्थिक सहायता की उम्मीद करते हैं. सीधे-सीधे 10,000 रुपए की मांग करते हैं. इतने सारे पर्व मनाए जाते हैं – सरस्वती पूजा, दुर्गा पूजा, ईद, मुहर्रम, 26 जनवरी, 15 अगस्त, करमा, सरहुल और क्रिसमस – सभी के लिए पैसा कहां से मिलेगा? पैसे ना दे पाएं तो सुनने को मिलता है कि चंदा नहीं दे पाते तो पार्षद ही क्यों बने हैं? कभी-कभी वृद्धा पेंशन आने में यदि देरी हो तो इस पर भी लोग भला-बुरा सुनाते हैं कि पार्षद क्या कर रही है, मेरे खाते में पैसा नहीं आ रहा. लोग मौहल्ले में किसी भी परेशानी में पड़ते हैं, तो उसके समाधान के लिए मेरे पास ही आते हैं. भले ही वो मेरे कार्यक्षेत्र से बाहर की बात हो. हर समस्या का समाधान करना मेरे लिए बहुत ही कठिन होता है.

लेकिन इन सब के बावजूद,

आज मैंने एक औरत होते हुए, नेता के रूप में अपनी एक पहचान बनाई है. मुझे ये काम अच्छा लगता है.

पति से अलग होने के बाद, मैं किसी दूसरे के साथ रह नहीं सकती हूं क्योंकि मैं एक आदिवासी महिला हूं और ईसाई धर्म को मानती हूं. मैं रात के वक्त पार्टी नहीं जा सकती. गांव मेरे लिए एक नज़र से सही भी है और गलत भी. सही इसलिए है कि मेरी सारी यादें गांव से ज़्यादा जुड़ी हैं. यहीं पली-बढ़ी हूं. पढ़ाई भी गांवों में रहकर की. वो कहते हैं ना कि कुएं का मेंढक क्या जाने बाहर का मज़ा या बंदर क्या जाने परवल का स्वाद? इसी तरह मैं भी कई वर्षों तक गांव में रहते हुए बाहर की दुनिया को नहीं जानती थी. आज शहर से वापस गांव लौटकर भी कई चीज़ों में मैं अधूरी ही हूं. यहां गांव में लोगों की जनप्रतिनिधि बन गई हूं लेकिन पति से अलग रहने के बावजूद भी कई कायदे-कानूनों में फंसी हुई हूं. गांव में समाज के साथ रहना पड़ता है. तो इस तरह से एक औरत कहीं भी आज़ाद नहीं है. सभी सवाल पर सवाल करते रहते हैं. कहते हैं कि तुमको सहना चाहिए. साथ रहना है तो सहना पड़ता है. आज एक अच्छे पद पर होकर भी मैं खुद को उसी स्थान पर रखे हुए हूं.

ऐसी कई परिस्थितियों को जब देखती हूं तो लगता है शायद इससे बेहतर तो शहर है. अच्छी रंगीन दुनिया में जी लो. तब ‘काश!’ शब्द बार-बार ज़हन में आने लगता है. समाज के लिए, परिवार के लिए कितना भी कर लो, लेकिन आप सीमित ही हैं. क्या शहरों में भी ऐसा होता है? हां, लेकिन गांव में लोग रात में मछली पकड़ते हैं औार शहरों में अपना काम पूरा करके सो जाते हैं.

मिलानी, वर्तमान में झारखंड में जन-प्रतिनिधि के रूप में नगर पंचायत प्रमुख हैं. वे दूसरी बार चुनी गई हैं. समाज की बेहतरी के लिए काम करने की उनकी लगन, 10 साल पहले उन्हें राजनीति में लाई. उनके जीवन में बहुत बड़ा मोड़ तब आया जब वे हॉकी टूरनामेन्ट में इसलिए नहीं खेल पाईं क्योंकि उन्होंने रिश्वत देने से इंकार कर दिया था. लेकिन उनका मानना है कि आज भी वे पेड़ों पर चढ़ सकती हैं और पी.टी. उषा से भी मुकाबला कर सकती हैं.
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