समाज

जहां हम राज्य, कानून, जाति, धर्म, अमीरी–ग़रीबी और परिवार की मिलती बिछड़ती गलियों के बीच से निकलते हैं और उन्हें आंकते हैं. यह समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे ये ढांचे अपने आप को नए ढंग और नए रूप से संचित करते हैं, फैलते और पनपते हैं. इस सबमें पितृसत्ता जीवन के अलग–अलग अनुभवों पर कैसे अपनी छाप छोड़ती है.

टॉय ट्रेन_सिलीगुड़ी

मेरी सगीना : सिनेमा और हकीकत के बीच सिलीगुड़ी

नए शहर की घुमक्कड़ी के रोमांच, कोरोना के खुलने के बाद की आकुलता, हउआ के सब चीज़ों को देख लेने की आकांक्षा से भरी एक टटकी बात. न्योता मिला एक शादी में जाने का. ढोल, बाजे- गाजे और बिग फैट इंडियन वेडिंग देखने का प्रलोभन कुछ ज़्यादा ही था. शादी के लिए एक नितांत नए शहर में जाना और नए किरदार खोजने का उत्साह उससे भी ज़्यादा.

दिल्लीः लटकनवाली हिंदी यानी हिंग्लिश का शहर

अपने भाषाई प्रयोग और कहने के अंदाज़ से दिल्ली एक दिलचस्प शहर है. सत्ता के इस शहर में लाखों कामगार – छोटे दुकानदार दिहाड़ी जिस पंजाबी-हरियाणवी, बिहारी-भोजपुरी के प्रभाव के साथ हिंदी का प्रयोग करते हैं, उस हिंदी में अंग्रेज़ी और उसके शब्द एक ख़ास किस्म की लटकन है.

“पीछे छूट गए लोगों के लिए यह शहर मुगलन था, अकेलेपन और छोड़ दिए जाने का पर्याय.”

दार्जिलिंग की हवादार गलियों में जब लोग दुकानों के बाहर और गलियों के मुहानों पर आग जलाकर बैठे होते हैं, तो किसी को भी ये आवाज़ें सुनाई दे सकती हैं – “अइया! के सरो चिसो हो!” (“भगवान, इतनी ठंड क्यों है!”). सूरज का दिखाई देना यहां किसी सामूहिक उत्साह से कम नहीं.

कोरोना वायरस

दूसरी लहर में कैसा था गांव का माहौल?

हमारा देश भी अजब-गजब का देश है. कुछ महीने पहले अख़बारों और सोशल मीडिया पर एक 84 साल के बुज़ुर्ग की तस्वीर बहुत दिखाई दे रही थी. कारण उन्होंने 10 महीने में 11 बार कोरोना का टीका लगवाया था और 12वीं बार टीका लगवाने के प्रयास में वो स्थानीय प्रशासन द्वारा पकड़ लिए गए.

दिल्ली

दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए

शहर जहां अपने लोगों को पहचान देता है वहीं इसकी भीड़ में बहुत आसानी से गुम हुआ जा सकता है. पर, क्या ये सभी के लिए संभव है? क्या होता है जब शहर किसी को अलग-थलग कर दे? क्या शहर का नक्शा हर तरह के व्यवहार और नज़रियों को ज़ेहन में रखकर तैयार किया जाता है?

हमारे शहर पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं

दुनिया भर में, शहरों को पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए डिज़ाइन किया गया है. और वो भी एक ख़ास तरह के पुरूषों के लिए जो – जवान, स्वस्थ और सिस-जेंडर हैं. इस कारण महिलाएं – युवा हों या बुज़ुर्ग, ट्रांसजेंडर समुदाय, और जेंडर के नियमों से परे किसी भी अन्य को – जो हट्टे कट्टे पुरुषों के इस सजातीय समूह में फिट नहीं होते – कई तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है.

‘ये सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है’

प्रोफ़ेसर डॉ. रॉबिन लॉ के मुताबिक, 1970 के दशक में आए कुछ महत्तवपूर्ण मार्गदर्शक शोध आलेखों ने पहली बार इस विचार को स्थापित किया कि महिलाओं का सार्वजनिक परिवहन का अनुभव पुरुषों से अलग होता है. प्रो. रॉबिन कहते हैं कि इसके बाद में दो समांतर शोध क्षेत्र उभरे. एक ने डर और यौनिकता पर ध्यान केन्द्रित किया.

संथाल समुदायों के घर_आदिवासी

आईने-सी विनम्र किताब

आदिवासी विल नॉट डांस के लेखक कथाकार हांसदा सोवेंद्र शेखर को एक किताब उनका हाथ पकड़कर अपने घर की तरफ़ वापस ले जाती है, जहां वे पले-बढ़े थे, लेकिन जिसकी बहुत सारी सच्चाइयां किताब के ज़रिए उनके सामने खुल रही थीं.

स्वास्थ्य बीमा योजना

अगर इलाज का खर्च जेब से भरना पड़े तो बीमा लेने से क्या फायदा?

हमने रवि दुग्गल से बात कर जाना कि क्यों आजकल स्वास्थ्य बीमा को एक ज़रूरत की तरह पेश किया जा रहा है? क्या हम स्वास्थ्य बीमा लेने और न लेने की दुविधा के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं? रवि के साथ इस बातचीत के ज़रिए पढ़िए स्वास्थ्य बीमा के टेढ़े-मेढ़े और उलझे रास्ते से निकलने का सही रास्ता क्या हो सकता है.

जाति का हमारे मानसिक स्वास्थ्य से क्या लेना-देना है?

डॉ. किरण वालेके ने द ब्लू डॉन – मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक सहयोगी संस्था- के साथ काम किया है और साफ़गोई भरे इस लेख में उन्होंने जाति, मानसिक स्वास्थ्य और चिकित्सा तक पहुंच के बारे में एक विश्लेषण पेश किया है.