समाज

जहां हम राज्य, कानून, जाति, धर्म, अमीरी–ग़रीबी और परिवार की मिलती बिछड़ती गलियों के बीच से निकलते हैं और उन्हें आंकते हैं. यह समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे ये ढांचे अपने आप को नए ढंग और नए रूप से संचित करते हैं, फैलते और पनपते हैं. इस सबमें पितृसत्ता जीवन के अलग–अलग अनुभवों पर कैसे अपनी छाप छोड़ती है.

“किसी व्यक्ति को भोजन के लिए दिन में तीन बार लाइन में खड़ा करना उन्हें अपमानित करना है.”

कर्नाटक के कार्यकर्ता, क्लिफ्टन डी’रोज़ारियो, ने यह साफ़ किया कि खाद्य सुरक्षा के बिना कोई सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था टिक ही नहीं सकती. वे मंथन लॉ, बंगलुरू से जुड़े एक अधिवक्ता हैं और अखिल भारतीय केंद्रीय ट्रेड यूनियन परिषद (AICCTU) के राष्ट्रीय सचिव और सीपीआई (ML) लिबरेशन, कर्नाटक के राज्य सचिव हैं.

“हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली हमसे अपेक्षा रखती है कि हम ख़ुद का ख़्याल रखें.”

मेनका राव एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जो स्वास्थ्य, पोषण और न्याय के मसले पर लगातार विस्तार से लिखती रही हैं. यहां वे पत्रकार के रूप में अपने सफ़र के बारे में बात कर रही हैं जिसमें वे सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने वाली बड़ी, जटिल और अक्सर चौंकाने वाली व्यवस्थाओं के बारे में रिपोर्टिंग करती रही हैं और यह बताती हैं कि कैसे कभी-कभी इनसे जुड़ी संस्थाओं की जड़ता नए स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती है.

औरतों के श्रम को कैसे नापा जाए?

नारीवादी अर्थशास्त्रियों द्वारा लंबे समय से श्रम को मापने के लिए काम के घंटों, ख़ासकर, महिलाओं के काम के घंटों की गणना को मापदंड के रूप में पैमाना बनाने पर ज़ोर दिया गया है. इस महामारी के दौरान ये नज़रिया और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है.

नर्सिंग और जाति की दर्जाबंदी

स्वास्थ्य सेवाओं के भीतर छूत-अछूत का मसला ही नहीं जेंडर भी यहां अपना रंग दिखाता है। ज़्यादातर नर्स महिलाएं हैं और इसके कारण कई तरह की जाति और जेंडर से जुड़ी दर्जाबंदी साफ़ दिखाई देती है।

आपको संघबद्ध क्यों होना चाहिए?

एनी राजा नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन (NFIW) की महासचिव हैं. अपने वजूद में आने के 65 से अधिक सालों में यह फेडरेशन उन मुद्दों के साथ लामबंद होता रहा है जो कामगार के तौर पर महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करते हैं.

वे महिलाएं जो फ़िल्म रचती हैं

क्या आपको वह आखिरी फिल्म याद है जिसे आपने देखा था? आपके द्वारा देखी गई वह कौन-सी अंतिम फिल्म थी जिसका निर्देशन किसी महिला ने किया था?

महिला किसान

अगर औरत किसानी कर सकती है, तो वह मालिक क्यों नहीं हो सकती?

कैसा दिखता है या दिखती है एक किसान? आपके मन में इसकी जो छवि उभरी है, मुमकिन है कि यह एक मर्द की छवि हो. यह कहना ठीक है कि यह एक रूढ़ छवि है.

मेरा ये मतलब नहीं था

“मुझे लगा वो शर्मीली है, मगर उसने तो शिकायत दर्ज कर दी”

द थर्ड आई के साथ बातचीत में ‘पार्टनर्स फॉर लॉं इन डेवलपमेंट’ की मधु मेहरा सहमति, अस्वीकृति और चाहत को समझने में हमारी मदद कर रही हैं.

Skip to content