अंक 002: जन स्वास्थ्य

भारत की जन स्वास्थ्य व्यवस्था एवं उसके भविष्य पर नारीवादी तफ़्तीश

“विज्ञान की शिक्षा का मतलब मिसाइल नहीं, बल्कि सड़क, बिजली और पानी है.”

हमने प्रो. मिलिंद सोहोनी से बात की और जाना कि सार्वजिनक स्वास्थ्य की हमारी अपेक्षाओं में विज्ञान की शिक्षा की क्या भूमिका है? कब हम विज्ञान के एक उपभोक्ता के रूप में बदल जाते हैं और भूल जाते हैं कि विज्ञान ने उन लोगों की सेवा करना बंद कर दिया है जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत है.

अगर इलाज का खर्च जेब से भरना पड़े तो बीमा लेने से क्या फायदा?

हमने रवि दुग्गल से बात कर जाना कि क्यों आजकल स्वास्थ्य बीमा को एक ज़रूरत की तरह पेश किया जा रहा है? क्या हम स्वास्थ्य बीमा लेने और न लेने की दुविधा के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं? रवि के साथ इस बातचीत के ज़रिए पढ़िए स्वास्थ्य बीमा के टेढ़े-मेढ़े और उलझे रास्ते से निकलने का सही रास्ता क्या हो सकता है.

स्वास्थ्य से याद आया…

बिहार में अलग-अलग समूहों से जुड़ी महिलाओं ने ज़ूम वीडियो कॉल पर बात करते हुए स्वास्थ्य से जुड़े हर मुद्दे पर हमसे खुलकर बात की. कम्प्यूटर का सर्वर ख़राब होने की दिक्कत से लेकर स्वास्थ्य केन्द्रों के भूसा घर में तबदील हो जाने की दास्तान यही बताती है कि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करना अमूमन भूसे के ढेर में सुई खोजने के समान है.

मन के मुखौटे, एपिसोड 02: रहोगी तुम वही

मानसिक स्वास्थ्य के तयशुदा खांचे से बाहर निकल, उसे आप बीती और जग बीती के अनुभवों एवं कहानियों के चश्में से समझने की एक महत्वाकांक्षी पहल – मन के मुखौटे- के दूसरे एपिसोड में हम लेकर आए हैं कथाकार सुधा अरोड़ा की कहानी ‘रहोगी तुम वही’. सुनिए कैसे भावनात्मक हिंसा की छोटी-छोटी किरचें इस कहानी में साफ-साफ दिखाई देती हैं.

जाति का हमारे मानसिक स्वास्थ्य से क्या लेना-देना है?

डॉ. किरण वालेके ने द ब्लू डॉन – मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक सहयोगी संस्था- के साथ काम किया है और साफ़गोई भरे इस लेख में उन्होंने जाति, मानसिक स्वास्थ्य और चिकित्सा तक पहुंच के बारे में एक विश्लेषण पेश किया है.

“मैं पागलपन की सर्वाइवर नहीं, मनोचिकित्सा की सर्वाइवर हूं.”

द थर्ड आई टीम ने मुलाक़ात की लेखक एवं शोधकर्ता जयश्री कलिथल से. जयश्री, भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने वाले शुरुआती कार्यकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने मानसिक तनाव एवं इससे जुड़ी परेशानियों के इर्द-गिर्द अपना कब्ज़ा जमा चुके मेडिकल मॉडल को अनुभवों एवं ज्ञान के स्तर पर चुनौती दी है.

मन के मुखौटे, एपिसोड 01: अड़ियल दुख

जन स्वास्थ्य विशेषांक में इस हफ़्ते हम आंखें बंद कर अपने मन-मस्तिष्क के भीतर झांकने की कोशिश कर रहे हैं. पब्लिक हेल्थ एवं पॉलिसी पर अभी तक हम कई तरह के सवाल-जवाब कर चुके हैं. इस बार बारी है स्वास्थ्य और सिस्टम के बीच मानसिक स्वास्थ्य को परखने एवं समझने की.

दुनिया रोज़ बनती है

कोविड की दूसरी लहर के दौरान लोग न केवल बीमारी से परेशान थे बल्कि भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी से बेहाल वे अनाज के एक-एक दाने के लिए तड़प रहे थे. हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए यह दोहरी मार है. मनीषा ने बाकि साथियों के साथ मिलकर द थर्ड आई रिलीफ़ वर्क के ज़रिए फलौदी गांव के कई इलाकों में घूम-घूम कर अनाज बांटने का काम किया ताकि लोगों को थोड़ी राहत मिल सके.

“इस बात में कोई शक नहीं कि हमारे भोजन और हमारे स्वास्थ्य में सीधा संबंध है.”

डॉ. ललिता रेगी और रेगी जॉर्ज ने 1992 में ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव की स्थापना की. एक कमरे में लगे सौ वॉट के बल्ब के साथ उन्होंने अपने सफ़र की शुरुआत की थी. आज ये एक कमरा, 35 बिस्तरों वाले बड़े से अस्पताल में बदल चुका है.

मज़दूरों के स्वास्थ्य के लिए मज़दूरों का अपना अस्पताल

जन स्वास्थ्य व्यवस्था सीरीज़ में द थर्ड आई के साथ बातचीत में डॉ. प्रियदर्श तुरे ने विकेन्द्रीकृत एवं कम्युनिटी द्वारा संचालित स्वास्थ्य मॉडल और उसकी प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की.

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