
चाह और फ़र्ज़ के बीच फैला नूर
वह 2006 का एक यादगार दिन था. रियाध में मेरे अब्बा के चचेरे भाई जुमे की नमाज़ के बाद घर आए हुए थे. अम्मी ने उस दिन कोरमा बनाया था. दस्तरख्वान पर बैठकर हम सब ने कोरमा खाने के बाद कहवा पिया.
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वह 2006 का एक यादगार दिन था. रियाध में मेरे अब्बा के चचेरे भाई जुमे की नमाज़ के बाद घर आए हुए थे. अम्मी ने उस दिन कोरमा बनाया था. दस्तरख्वान पर बैठकर हम सब ने कोरमा खाने के बाद कहवा पिया.
मेरी एक छात्रा हुआ करती थी जो बहुत कम बोलती थी. बस उतना ही बोलती जितने की उसे ज़रूरत होती, वो भी काफी कम. ऐसा नहीं है कि उसे बोलने से डर लगता था या वह संकोची रही हो. बस अपने शब्दों को लेकर वह इतना सतर्क रहती थी कि जब तक समझ न आए क्या बोलना है, वह चुप रहती थी.
भोपाल में रहने वाली सबा का मानना है कि “शिक्षा के बारे में स्कूल के बाहर बात की जानी चाहिए, स्कूल के बाहर स्टुडेंट होना ज़्यादा आसान है.” सबा भोपाल में 2010 से शिक्षक साथियों (पुस्तकालय के भूतपूर्व सदस्य) की मदद से ‘सावित्री बाई फुले फातिमा शेख पुस्तकालय’ चला रही हैं.
हमारे पहले दो सत्र खेलकूद के साथ एक दूसरे को जानने की कोशिश थे. पहले सत्र में, बहुत सारे खेल खेलने के बाद जब हम बातचीत के लिए बैठे, तो टोली की एक 18 या उससे कम उम्र की लड़की ने झट से कहा कि इस सत्र ने उसे उसके बचपन की याद दिला दी.
उत्तर-प्रदेश के बांदा ज़िले से आई दो लड़कियां उमरा और कुलसुम, झोला उठाकर दिल्ली महानगर में ठसक से अपना रास्ता बनाती हुई चलती हैं. कैमरा उनके पीछे-पीछे चलता है. 28 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म में वे सारी दकियानूसी बातें जो लड़कियों को अक्सर सुनने को मिलती हैं, कांच की तरह टूटकर गिरते हुए दिखाई देती हैं.
सावित्रीबाई फुले के 190th जन्मदिवस पर, आज के भारत की एक युवा लड़की ने उन्हें पत्र लिखा. सावित्रीबाई फुले पहली महिला अध्यापक थीं और भारत में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने वाली भी पहली व्यक्ति थीं.