अंक 004: शिक्षा

नारीवादी शिक्षा: अनुभवों और सवालों की धारा में

ट्रेलर: “फ से फ़ील्ड, श से शिक्षा”

भारत के ग्रामीण इलाकों से निकले, शिक्षा के अनुभव और उनमें कल्पनाओं के पंख लगाए 10 कहानियों की यह ऑडियो शृंखला अब आपके सामने है. इस शृंखला की हर कहानी अपने आप में शिक्षा के अनुभवों और उन्हें देखने के नज़रिए से बिलकुल जुदा है.

हमारा हिसाब कौन देगा?

मैं एक आदिवासी गोंड समुदाय में पैदा हुई. मेरे मां-बाप की मैं पहली संतान हूं. वैसे तो मेरे घर में 6 सदस्य हैं. माता-पिता के अलावा हम तीन बहन और एक भाई है. मेरे पिताजी और मां दूसरों के खेतों में काम करते हैं.

‘ये है असुर अखड़ा रेडियो, नाचेंगे…खेलेंगे…गाएंगे…’

झारखंड राज्य की राजधानी से लगभग 150 किलोमीटर दूर लातेहार ज़िले में नेतरहाट का इलाका अपने खूबसूरत पहाड़ों और जंगलों के लिए जाना जाता है. ठंड यहां पूरे साल बनी रहती है. पहाड़ों पर छोटे-छोटे गांव बसे हैं.

एक हिंदी ग्राफिक उपन्यास शिक्षा के बारे में हमारी समझ कैसे बदल रहा है

बिक्सू, हिंदी का सर्वाधिक चर्चित ग्राफिक नॉवेल है. कहानी में बारह साल का लड़का विकास कुमार विद्यार्थी जिसे प्यार से सभी बिक्सू पुकारते हैं, अपने घर से दूर एक मिशनरी बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया है. एक तरफ पीछे छूटे घर, गांव और परिवार की याद है तो दूसरी तरफ नई दुनिया, दोस्त और बोर्डिंग स्कूल के विचित्र अनुभव.

मेरी कीमती चीज़

क्या आपने कभी ठहरकर उस कलम की ओर देखने की कोशिश की है जो किसी न किसी तरह से हर वक्त आपके आसपास होती है? कलम ही क्यों, कोई बैग, डायरी, झोला, दुपट्टा रोज़मर्रा की भाग-दौड़ में कभी ठहरकर देखें तो एक मीठा आश्चर्य होता है कि कैसे और कब कोई एक चीज़ इतनी खास हो जाती है कि वो हर वक्त हमारे पास होती है.

अपनी गली तो दिखाओ ज़रा

आशियान का रंग-ढंग किसी स्काउट जैसा है. वह शाहदरा की वेलकम कॉलोनी की 15-20 दूसरी लड़कियों और औरतों के साथ गंदगी और कूड़े-कचरों से अटी पड़ी गलियों से गुज़रती हुई आगे बढ़ रही है, जिसके दोनों तरफ बने घरों की दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, प्लास्टर झड़ चुके हैं और ईंटों ने ताकझांक करना शुरू कर दिया है.

एक ट्रांसजेंडर शिक्षक के शिक्षा के अनुभव

डॉ. राजर्षि चक्रवर्ती बर्द्धमान विश्वविद्यालय में इतिहास विषय पढ़ाते हैं और बतौर सहायक प्रोफेसर कार्यरत हैं. इतिहास के एक शिक्षक के रूप में उनकी यात्रा 1999 से शुरू होती है जब उन्होंने कलकत्ता के तिलजला ब्रजनाथ विद्यापीठ में पहली बार पढ़ाना शुरू किया था. राजर्षी 1997 से एलजीबीटीक्यूआई+(LGBTQIA+) आंदोलनों से भी जुड़े हैं.

क्या आप हमें जानते हैं?

सन् 2013 में निरंतर संस्था ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म का निर्माण किया था. यह फ़िल्म उन लोगों के स्कूली अनुभवों पर आधारित थी जो स्त्री-पुरुष बाइनरी में खुद को अनफिट महसूस करते थे. नृप, सुनील और राजर्षि इस फ़िल्म के केंद्रीय पात्र हैं जो क्रमशः ठाणे, बेंगलुरु और कोलकाता में रहते हैं.

“हमें अपने शरीर को देखकर शर्म आती थी, इसलिए हम खुद को और अपनी देह को पसंद नहीं करते थे”

लेखिका, रंगकर्मी और दलित एक्टिविस्ट दू सरस्‍वती की निगाह में समुदाय और व्‍यक्ति एक दूसरे से आपस में जुड़े हुए हैं. उनका रंगकर्म और कविकर्म व्‍यक्ति के निर्माण को ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्‍कृतिक ताकतों की संयुक्‍त उपज मानता है.

लव, सेक्स और क्‍लासरूम

पढ़ाई के दौरान हमें पांच बार फोटोसिंथेसिस के बारे में पढ़ना पड़ा. छठी क्लास से ग्यारहवीं तक हर साल लगातार मैं उसकी परिभाषा भूल जाता था इसलिए मुझे फिर से रटना पड़ता था, बावजूद इसके कि फोटोसिंथेसिस का मतलब मैं अच्छे से समझता था. इसी तरह हर साल मुझे बार-बार सीखना पड़ता था कि मेरी क्‍लास के लड़के दूर से ही मेरी हकीकत सूंघ लेते थे.

Skip to content