संपादकीय – अंक 001: काम

औरतों के काम को कैसे नापा जाए? उसका अनुमान कैसे लगाया जाए? वे कब काम करती हैं, कितना काम करती हैं और कौन−सी क्रिया को काम का दर्जा दिया जाए? इन सब सवालों के जवाब और और उनकी सीमाओं पर नारीवादी विमर्श एक अरसे से जुटा है.

हमने भी इस संकलन में इन सवालों को समझने और समझाने के लिए कई नक्शे, तालिकाएं और फ्लोचार्ट बनाए.
लेकिन इस कीमत और दाम लगाने की कोशिश में हम निजी रिश्तों की रौशनी और गर्माहट को, अलग नहीं कर पाए. आखिर, उस प्यार की क्या कीमत लगाई जाए जो हमारा पूरा समय, हमारा आराम, हमारी पूरी ज़िंदगी तक अपने में समेट लेता है. इस मोल, पैसे, संसाधन प्यार, देखरेख और परिवार के बीच की खाई को कैसे पार किया जाए?

काम के लिए कभी कम पैसे मिलते हैं, कभी बिलकुल नहीं. ये वे काम हैं जिन्हें काम माना ही नहीं जाता. जैसे नर्सिंग या देख रेख का काम. आज कोविड के चलते नर्सों को ‘योद्धा’ का दर्जा दिया जाने लगा है. मगर क्या ये काम सिर्फ अस्पताल तक सीमित है? उन सब हज़ारों लाखों औरतों का क्या जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा घर के लोगों की शारीरिक और मानसिक देखभाल करना है?

काम तो सभी करते हैं. लेकिन हम आदमियों और औरतों के काम का जिस तरह से विश्लेषण करते हैं, उनके काम के लिए जिस तरह की शब्दावली इस्तेमाल करते हैं दरअसल वही हमारी सोच और पूर्वाग्रहों का मापदंड भी है. जब किसी औरत को कामकाजी कहा जाता है तो उसका आशय सिर्फ इतना नहीं कि वह घर के अलावा कहीं बाहर भी काम करती है. काफी संदर्भों में इसका मतलब ये भी है कि वह औरत अपनी घरेलू ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह नहीं निभा रही है. अपने बच्चों, पति या परिवार के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं है.

जो औरतें सेक्स वर्क से अपना और अपने परिवार का पेट भर्ती हैं उन्हें पेशेवर कहा जाता है. यहां पेशे से मतलब ‘प्रॉफ़ेशन’ नहीं है बल्कि नैतिक पतन या चरित्रहीनता है. यानी औरत का काम, चाहे वो मुख्यधारा का काम हो या हाशिए का, चाहे वह शारीरक काम हो या यौनिक. उसे देखने और नापने का नज़रिया बिलकुल अलग है. इज़्ज़त और बदनामी के बीच का फासला यहां बहुत कम है.

हमारा काम हमें अपनी जाति और जेंडर की विरासत में मिला है. हममें से कुछ के हाथ मुलायम हैं– ये हमारी जाति और वर्ग की देन हैं. कुछ की पीठ मज़बूत और पेट खाली है, जो हमारे इतिहास की देन है. हमारे शरीर संस्कृति, परंपरा और जी.डी.पी. के बहुमुखी नाग को अपने श्रम से संतुष्ट करने में भी लगे है. अंत में उस काम को कैसे मूल्य दें जो किसी उच्च जाति के पुरुष द्वारा नहीं किया गया.

ऐसे ही कुछ सवालों के साथ द थर्ड आई के पहले संस्करण में आपका स्वागत है. इस पोर्टल का यही प्रयास है कि कैसे नारीवादी विमर्श को ‘सीखने’ की प्रक्रिया से जोड़ा जाए, और जो हाशिए पर है उसे हमारे चिंतन के केंद्र में कैसे लाया जाए?

यह पोर्टल निरंतर के तीन दशकों के इतिहास को समेटता है, जो ज्ञान के सृजन, उस पर हक और ज्ञान के प्रसार पर सृजनात्मक काम करता आया है. हम द थर्ड आई की शुरुआत भी ज्ञान से जुड़े एक मूल सवाल से करना चाहते हैं – कि निज़ी और सार्वजनिक के बीच का रिश्ता क्या है? उसके बहुरंगी प्रकार क्या हैं जिनसे हम क्या करते हैं और हम कौन हैं, परिभाषित होते हैं. इस निजी और सार्वजनिक के बीच की दुनिया से द थर्ड आई आपको काम से जुड़े विविध नज़रियों से परिचित कराती है. इन विचारों और अनुभवों को आप टटोलें, उन्हें चर्चा और बहस का यंत्र बनाएं और नए विचारों को पनपने का मौका दें. इन सब को मुमकिन करने के लिए कहानियों, फिल्म, पॉडकास्ट अध्ययन का पिटारा है जो औरतों और क्वीयर फोल्क्स को केंद्र में रखता है.

घर के काम का बंटवारा और हमारी जेंडर की पहचान के नाज़ुक रिश्तों से गुंथा ‘कुईयर घर: बसने बसाने का काम’ लेख यौनिकता, जेंडर और घरेलू काम की उधेड़बुन को दर्शाने की कोशिश करता है. उस प्रसव का क्या जो बच्चा जनने का श्रम तो निभाती है मगर अपने परिवार के लिए नहीं, किसी दूसरे परिवार के लिए. इस पर हम ‘नौ लंबे महीने’ लेख में सुरभी शर्मा से उनकी फिल्म ‘कैन वी सी द बेबी बंप’ के ज़रिए बातचीत करते हैं. कैसे उस सरोगेट महिला को ढूंढा जाए जो एक फलते-फूलते करोड़ो के व्यापार की नींव तो है लेकिन शर्म की कैद में बंद भी है.

द थर्ड आई विजिला चिराप्पड की कविता और श्रुजना निरांजनी श्रीधर की पेंटिग के बीच बातचीत को ‘मलिन भूमि’ के ज़रिए आगे बढ़ाती है जो दर्शाती है कि हमारे घर की चौखट कैसे जातिवाद को आज भी बनाए रखती है.
ग्रामीण महिला पत्रकार और उनके ट्रोल्स’ लेख में हम दो खबर लहरिया के पत्रकारों की बातचीत भी सुनते हैं जो कस्बों और गांवों की डिजिटल तारों के फैलते जाल में प्रशंसकों और ट्रोल्स के दावपेच में अपनी हाज़री लगाते हैं. क्या डिजिटल को नए तरीकों से सीखना इसे ब्राह्मणवादी चंगुल में फसने से बचा सकता है? ‘डिजिटल, भला ये है क्या?’ में AppDiL की टीम यह मानती है कि अगर गांव की औरतों को टैक्नोलॉजी के केंद्र में डाल दिया जाए तो जातिवाद के बोलबाले को कुछ तो ठेस पहुंचेगी.

हमारा दूसरा पॉडकास्ट ‘स्टे होम, कितना सुरक्षित’, जेंडर आधारित हिंसा और डिजिटल दुनिया को बिशाखा दत्ता और उत्तांशी अग्रवाल के नज़रिए से इसके भयानक और ताकतवर रूप में सामने रखता है.

एक लेखक के काम को कैसे देखें? ‘लेखन का काम’ में शर्मिला और प्रभात हमें अंकुर की उस अनोखी और दमदार प्रक्रिया के बारे में बताते हैं, जिसने दिल्ली के अलग-अलग कोनों से हिंदी के लेखकों को एक आवाज़ और रूप दिया.
(उनकी कहानियां भी पढ़िए – प्रीतियां और दुकानदारी) और इस संस्करण में हिन्दुस्तान की पहली फोटो पत्रकार (जर्नलिस्ट) होमाय व्यारवाला भी हैं – सबीना गाधियोक के शब्दों में. वे अपनी तस्वीरों और शब्दों से यह कहती हैं कि औरतें हमसे बहुत पहले सार्वजनिक क्षेत्र में अपना हक या उपस्थिति जमा रही थीं.

वे यहां आती ही क्यों हैं?’ लेख में सुनीता रानी, ‘राष्ट्रीय घरेलू कामगार यूनियन’ की प्रेसिडेंट, हमें मिलकर आवाज़ उठाने का महत्त्व याद दिलाती हैं. कोविड के समय में बस्तियां क्यों खाली हो रही हैं, इसके कारण के पीछे घरेलू कामकाजी कामगार महिलाओं की स्थिति का ब्योरा देती हैं. कोविड ने इस पहलू को सबकी नज़रों के सामने रखा कि देखरेख का काम हमें बनाए रखने में मूलभूत काम है और इसका दारोमदार, महिलाओं के कंधों पर ही डाला गया है. हमारी चंबल मीडिया के साथ लघु वीडियो शृंखला 2020 में प्रवासियों की भयानक यात्रा और फंर्टलाइन वर्कर महिलाओं को दिखाती है.
ये हमारे पहले संस्करण के कुछ दृश्य हैं जो विचारों और हकीकतों, इतिहास और भविष्य में हमारे काम की दुनिया को बाहर और भीतर से देखते हैं. यह कैसे हमारे जीवन को आकार देते हैं हम इससे एक कदम हटकर इसके बारे में सोच भी सकते हैं.

इस पिटारे में दी गई कार्यशालाओं ऑडियो, वीडियो, लेख और शब्दों को आप अपना बनाएं. अपने खुद के सीखने सिखाने के मॉड्यूल बनाकर व्हाट्सऐप समूहों में इन विचारों को फैलाएं, सवाल उठाएं और नए अनुभव सामने लाएं. मिलकर आप और हम ज्ञान और जानकारी के नए आयामों का सृजन करते हैं जो बराबरी और नारीवादी विमर्श की नींव है.

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