“प्रतिरोध की राजनीति ‘मज़ा’ के बिना अधूरी है.”

सलीम किदवई (7 अगस्त 1951 – 30 अगस्त 2021) एक इतिहासकार और स्वतंत्र विद्वान थे, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बीस वर्षों तक अध्यापन किया. उन्होंने मध्यकालीन और आधुनिक भारत पर कई अकादमिक निबंध प्रकाशित किए हैं और कई कृतियों का अनुवाद किया है, जिनमें मलका पुखराज द्वारा लिखित “सॉन्ग सुंग ट्रू: ए मेमॉयर” और सैयद रफीक हुसैन की लघु कथाओं का संग्रह “द मिरर ऑफ वंडर्स” शामिल हैं.

किदवई उस समय 26 साल के थे और दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तीन साल से पढ़ा रहे थे जब उन्होंने रूथ वनिता (अमरीका के मोंटाना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) के साथ मिलकर एक बड़ी मार्के की किताब लिखी थी जिसका नाम है – “सेम सेक्स लव इन इंडिया : रीडिंग्स फ्रॉम लिटरेचर एंड हिस्ट्री” (भारत में समलैंगिक प्यार: साहित्य और इतिहास से ली गई पठन सामग्री). इसमें संस्कृत और फारसी-उर्दू परंपरा के हवाले से उन्होंने इस मिथक को तोड़ा कि समलैंगिकता, हमजिंसियत एक पश्चिमी विचार है. यह किताब 2001 में प्रकाशित हुई थी. इसके कुछ हिस्सों का धारा 377, जो कि समलैंगिकता को अपराध ठहरानेवाला अंग्रेज़ों के समय से चला आ रहा (औपनिवेशिक काल का) कानून है, को लेकर चल रहे मुकदमे में इस्तेमाल किया गया था. 

एक साक्षात्कार में सलीम बताते हैं कि, “1977 में कनाडा में मेरे साथ एक बहुत ही भयानक और अपमानजनक घटना घटी. गे होने की वजह से जिस तरह से आपको परेशान किया जाता है, आप खुद के बारे में तिरस्कार की भावना से भर जाते हैं. लेकिन उस घटना ने मेरे दिमाग में एक बात बिलकुल साफ कर दी कि पश्चिम जवाब नहीं है. उसके पास जवाब नहीं है और अगर हमारी दुनियाओं को बदलना है तो इसकी शुरुआत मैं अपने देश से करूंगा.”

सलीम का मानना था कि राजनीतिक रूप से ये बहुत ज़रूरी है कि आपके पास सार्वजनिक जगहों पर पार्टी करने की जगहें हों. जब आप एक ऐसी जगह बनाते हैं तो आप देखेंगे कि उसे बचाने के लिए कितने सारे लोग आ जाएंगे. हो सकता है कि वो नागरिक अधिकार या ह्यूमन राइटस के लिए न खड़े होते हों लेकिन वो अपनी जगह को बचाने के लिए खड़े होंगे और यहां से भी क्रांति का रास्ता खुलता है.

“राजनीति में मज़ा की भी महत्त्वपूर्ण जगह है. 80 के दशक में हमारी कोशिश थी कि हम प्राइवेट गे पार्टियों को सार्वजनिक जगहों पर ले जाएं. हमने गे क्लब जैसी जगहों की तलाश करनी शुरू की और कुछ ही समय में उस ग्रुप में लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ती चली गई.”

1999 में सलीम, चपल मेहरा और कुछ और दोस्तों ने मिलकर ‘हमराही’ नाम से एक क्वीयर समूह बनाया. हमराही, सुरक्षित सेक्स के तरीकों से लेकर जबरन शादी और पुलिस द्वारा गिरफ्तारी तक – तरह तरह के मुद्दों पर चर्चाएं आयोजित करती थी. एक तरह से आज समलैंगिक आंदोलन जहां खड़ा है ये उसकी नींव थी.

सलीम, लखनऊ के लखनऊ सलीम का

लखनऊ शहर और बेगम अख्तर से बेपनाह मोहब्बत ही सलीम को बार – बार लखनऊ की तरफ मोड़ती रही. इतना कि दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से रिटायरमेंट के बाद वो हमेशा के लिए लखनऊ लौट गए. 17 साल की उम्र में उन्होंने लखनऊ छोड़ा था ताकि अपनी समलैंगिक पहचान को थोड़ी ही सही लेकिन आज़ादी दे सकें.

“सलीम किदवई की ज़िंदगी: हर पहलू क्वीयर, हर पहलू सतरंगी” एक छोटी फिल्म है जो इतिहासकार और लेखक सलीम किदवई के जीवन के बारे में है. निरंतर संस्था द्वारा सलीम किदवई को एक सलाम है. उम्मीद है कि इसे देखने से लोग सलीम जी को याद करेंगे और साथ ही ये सोचने का मौका मिलेगा कि आज के समय में “क्वीर” होने का क्या मतलब है – चाहे हम एलजीबीटी हों या नहीं.

निर्माण 
जया शर्मा 

टेक्स्ट 
धमिनी रतनम 

संपादक 
शिवम रस्तोगी 

आवाज़ 
सोहनी हर्षे 

डिज़ाइन 
ज्योत्सना सिंह 
शिवम रस्तोगी 

टाइपोग्राफी 
अरविन्द रामाचन्द्रन 

पोस्टर 
अंकिता धर 

  • द थर्ड आई की पाठ्य सामग्री तैयार करने वाले लोगों के समूह में शिक्षाविद, डॉक्यूमेंटरी फ़िल्मकार, कहानीकार जैसे पेशेवर लोग हैं. इन्हें कहानियां लिखने, मौखिक इतिहास जमा करने और ग्रामीण तथा कमज़ोर तबक़ों के लिए संदर्भगत सीखने−सिखाने के तरीकों को विकसित करने का व्यापक अनुभव है.

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